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Monday, 26 November 2007
आलू की EMI , जिन्न और अलादीन
आलू के भाव जहां जा चुके थे, उनकी ईएमआई चुकाना अलादीन के बूते के बाहर की बात थी। अलादीन हैरान-परेशान बैठा था कि एक बोतल में जिन्न जैसा कुछ दिखाई दिया। जिन्न ने पूछा- प्यारे अलादीन, शादी के बाद यूं तो सब परेशान रहते हैं, पर तेरी परेशानी कुछ ज्यादा वोल्टेज की लग रही है, क्या सेंसेक्स डूबने से तू व्यथित है? सेंसेक्स डूबने के बाद कई बंदे इधर डूबने आते हैं, पर अब यहां पानी नहीं बचा है। डूबने वाले पत्थर से टकरा जाते हैं, हाथ-पैर तुड़वा बैठते हैं। घर वाले डांटते हैं कि अगर मरना ही है, तो किसी मकान का लोन लेकर किसी बैंक के गुंडों के हाथों मरो ताकि कुछेक लाख का मुआवजा कोर्ट दिलवा दे। इतना शर्मदार तू है नहीं कि चुल्लू भर पानी में डूब जाए। वैसे जो शख्स आलू की ईएमआई अफोर्ड न कर पाए, उसे डूब मरना चाहिए पर चुल्लू भर पीने का पानी भी उस भाव होने लगा है कि उसकी ईएमआई भी तू अफोर्ड ना कर सकता।
खैर, बता तेरे लिए कोई हूर का जुगाड़मेंट करूं। मेरे पास हूरों को बुलाने की पावर है।
अलादीन हूरों का नाम सुनकर डर गया और पूछने लगा- ओफ्फो तो हूरों भी आलू खाएंगी। उनके आलुओं का पैसा कहां से आएगा। अबे जिन्न, हूर-शूर तलाशने के दिन गए। यह बता कि आलू का जुगाड़ तू कर सकता है क्या। जिन्न हंसने लगा और बोला- बेट्टा अब आलुओं की ईएमआई अफोर्ड करना अगर मेरे बूते में होता, तो काहे को डर कर मैं इस बोतल में रहता। घर जाते हुए शर्म आती है कि आलू तक अफोर्ड नहीं कर सकता। सो अब बोतल में रहता हूं। लेटेस्ट खबर यह है कि जिन्न को बोतल से निकालने की बजाय अलादीन खुद भी बोतल में घुसकर रहने का प्रयास कर रहा है।
-आलोक पुराणिक का लेखांश, नवभारत टाइम्स से साभार
Saturday, 24 November 2007
मैं इस घर को आग लगा दूंगा ...
बिल्डर गैरी हूली अपनी पत्नी मिशेल से गुस्से में यह बात पहले भी कई बार कह चुका था। पुलिस को वह अपनी वैन में सोया हुआ मिला। हालांकि उसका कहना है कि यह काम उसका नहीं है। लेकिन उसका भरोसा किसी को नहीं। उसने उस रात काफी बियर पी थी।
नवभारत टाइम्स की खबर है कि घटना की रात दोनों मिशेल की एक सहेली के यहां पार्टी में गए थे। वहां भी गैरी काफी खराब मूड में था। मिशेल डांस करने गई। उसे अपने पर्स का ख्याल रखने को कहा तो वह नाराज हो गया। हालांकि बाद में दोनों ने साथ डांस किया तो उसका गुस्सा कुछ कम हुआ था। लेकिन बाद में फिर झगड़ा हो गया।
झगड़े की वजह से रात को मिशेल घर भी नहीं लौटी। अपनी सहेली के घर ही रुक गई। सुबह पुलिस से ही सूचना मिली कि उसके घर में आग लग गई है। उसके सारे कपड़े और दूसरा सामान भी जल गया।
50 वर्षीय हूली ने कुछ दिन पहले ही अपने बंगले का साज सज्जा करवाई थी। बंगला मिशेल के नाम में था। पहली शादी से मिले इस बंगले के बीमे की किस्तें भी वही दे रही थी। महंगे जेवरात और 70 जोड़े जूतों का भी बीमा कराया हुआ था।
गैरी और मिशेल बचपन से एक दूसरे को जानते थे। शादी से पहले 2 साल तक इश्क चला था। लेकिन शादी होते ही इश्क हवा हो गया। पिछली जुलाई से कई बार दोनों ने अदालत के कहने पर साथ रहने की कोशिश की। लेकिन कामयाबी नहीं मिली। लगता है यह समस्या सर्वव्यापी है.
Sunday, 11 November 2007
बेटा तो फंसा है ...
सास समझाए हो झगड़ा, मां का पाला तगड़ा
मायके की फटकार भाई को बुरी लगे
इस साइड बारंबार ससुराल में पति प्यार से समझाए
न बने मां बीबी की लड़ाई में दीवार
पति गर बोले तो मां दुखी, न बोले तो रात बेकार
तो हो कैसे समझौता, बेटा तो फंसा है यार
Wednesday, 7 November 2007
दो सगे भाइयों ने एक ही महिला से रचाई शादी
द्वापर युग में द्रौपदी ने पांच पांडवों को अपना पति स्वीकार किया था, वहीं कलयुग में कैलाशी के इस कदम से हर कोई हतप्रभ है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके पति पांच नहीं बल्कि दो होंगे, जिनके साथ वह महीने में 15-15 दिन रहेगी। इस बात की जानकारी गांव में हर किसी को थी।
रविवार दोपहर खेसरहा थाने से मात्र पचास मीटर दूर मुख्य सड़क पर एक छोटे से पक्के मकान में शादी की रस्में पूरी की गई। दूल्हा थे दो सगे भाई छोटे लाल और झीनक वर्मा , जबकि पत्नी थी चार बच्चों की मां कैलाशी देवी (45)। मंत्रोच्चार के बीच दोनों भाइयों ने कैलाशी के साथ सात फेरे लिए और उसके गले में अलग-अलग मंगल सूत्र डाले। शादी में दो सिंहोरे का भी प्रयोग हुआ। तीनों पति-पत्नी के रूप में बेहद खुश हैं। मूंगफली बेच कर जीवन-यापन करने वाले दोनों भाई इस उम्र में भी अविवाहित थे।
कैलाशी संग एक साथ ब्याह रचाने के सवाल पर छोटेलाल व झीनक ने बताया कि दोनों भाइयों में बेहद प्रेम है। अपनी सोच के अनुसार दोनों को एक साझा दूल्हन की तलाश थी, मगर इसके लिए कोई लड़की राजी न होती थी। आखिर पड़ोस के ग्राम पकड़डीहा के राम नारायन वर्मा की विधवा पुत्री और चार बच्चों की मां कैलाशी से रिश्ते की बात चली। पहले तो कैलाशी का पिता अपनी पुत्री का विवाह दोनों भाइयों से करने को राजी नहीं था, मगर कहीं और बात न बनते देख और कैलाशी की सहमति के बाद वह राजी हो गया। एक ही पत्नी के साथ दोनों कैसे रहेंगे, इस पर दोनों भाइयों का कहना था कि वह महीने में 15 दिन एक की पत्नी के रूप में और शेष 15 दिन दूसरे की पत्नी बन कर रहेगी। वहीं, इस बारे में कैलाशी का कहना था कि वह इस शादी से खुश है।
Sunday, 4 November 2007
प्रताडित पति ने एक करोड़ दान किये
इस साल जुलाई में शादी के महज १४ दिन बाद ही पेशे से लिपिक, फैजाबाद के श्रीकांत पाण्डेय (२९) की इनकी पत्नी से कतिपय मुद्दे पर अनबन हो गयी।
पत्नी सावित्री मायके चली गयी। पत्नी की वापसी के लिए श्रीकांत ने फैजाबाद की पारिवारिक अदालत में मुकद्दमा दायर किया।
जवाब में ससुराल वालों ने दो लाख के जेवर और तीन लाख रूपये नगद मांगने का आरोप लगाते हुए श्रीकांत के खिलाफ ही FIR लिखवा दी। इससे आहत श्रीकांत ने अपनी एक करोड़ रूपये मूल्य की पूरी चल-अचल सम्पति प्रधानमंत्री कोष में दान कर दी।
श्रीकांत के इस कदम से ससुराल वालों की ............*&^%@#%>< () ... गयी। उनके आग्रह पर गोरखपुर पुलिस की सहायता से पति पत्नी के बीच सुलह हो गयी, लेकिन श्रीकांत ने साफ कर दिया कि वे प्रधानमंत्री कोष में दान दी गयी सम्पति वापस नहीं लेंगे।
वाह।
Saturday, 3 November 2007
दो पाटन के बीच में
एक नवविवाहित युवक अपनी माँ और पत्नी के बीच बढ़ते मनमुटाव से बेचैन था।
'बेटा, बहू को समझा लेना।' 'देखिए, माँ को समझा दीजिए।' ये संवाद रह-रहकर उसके कानों में गूँजते रहते थे। वह दोनों के बीच सेंडविच बन चुका था। वह किसी एक के पक्ष में बोलकर स्थिति को बदतर नहीं करना चाहता था।
एक दिन उसे एक उपाय सूझा। उसने उस पर अमल करना शुरू कर दिया। जब भी उसकी माँ उसके सामने पत्नी की शिकायत करती तो वह कहता- माँ, आप बेकार ही बहू के पीछे पड़ी हैं। वह तो आपकी तारीफ करते हुए कहती है कि मुझे तो माँ जैसी सास मिली है। और जब रात को पत्नी की रामायण शुरू होती तो उससे कहता- पता नहीं तुम्हें क्या गलतफहमी है। माँ तो तुम्हें अपनी बेटी से भी बढ़कर मानती है और कहती है कि मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो ऐसी बहू मिली। इस तरह वह एक के सामने दूसरे पक्ष की तारीफ करने लगा। इससे धीरे-धीरे सास-बहू के मन में एक-दूसरे के प्रति प्यार उमड़ने लगा। अब तो वह पत्नी को कुछ कहता तो माँ डाँट देती और माँ से कुछ कहता तो पत्नी टोक देती।
-'दो पाटन के बीच में साबुत बचा है कोय', वेबदुनिया पर मनीष शर्मा के लेखांश
Thursday, 5 July 2007
पुत्र की भावनाएँ पिता के लिए
एक बेटा अपनी उम्र में क्या सोचता है?
४ साल - मेरे पापा महान हैं।
६ साल - मेरे पापा सब कुछ जानते हैं।
१० साल - मेरे पापा अच्छे हैं, लेकिन गुस्सैल हैं।
१२ साल - मेरे पापा, मेरे लिए बहुत अच्छे थे, जब मैं छोटा था।
१४ साल - मेरे पापा चिड़चिड़ाते हैं।
१६ साल - मेरे पापा ज़माने के हिसाब से नहीं चलते।
१८ साल - मेरे पापा हर बात पर नुक्ताचीनी करते हैं।
२० साल - मेरे पापा को तो बर्दाश्त करना मुश्किल होता जा रहा है, पता नही माँ इन्हें कैसे बर्दाश्त करती है?
२५ साल - मेरे पापा तो हर बात पर एतराज़ करते हैं।
३० साल - मुझे अपने बेटे को संभालना तो मुश्किल होता जा रहा है। जब मैं छोटा था, तब मैं अपने पापा से बहुत डरता था।
४० साल - मेरे पापा ने मुझे बहुत अनुशासन के साथ पाल-पोस कर बड़ा किया, मैं भी अपने बेटे को वैसा ही सिखाऊंगा।
४५ साल - मैं तो हैरान हूँ किस तरह से मेरे पापा ने मुझको इतना बड़ा किया।
५० साल - मेरे पापा ने मुझे पालने में काफी मुश्किलें ऊठाईं। मुझे तो तो बेटे को संभालना मुश्किल हो रहा है।
५५ साल - मेरे पापा कितने दूरदर्शी थे और उन्होंने मेरे लिए सभी चीजें कितनी योजना से तैयार की। वे अपने आप में अद्वितीय हैं, उनके जैसा कोई भी नहीं।
६० साल - मेरे पापा महान हैं.
