अलादीन बीवी की डांट खाकर टहल रहा था समुद्र किनारे। बीवी ने डांटा था कि तुम्हारी हैसियत नहीं है आलू तक की, तो शादी किस मुंह से की?
आलू के भाव जहां जा चुके थे, उनकी ईएमआई चुकाना अलादीन के बूते के बाहर की बात थी। अलादीन हैरान-परेशान बैठा था कि एक बोतल में जिन्न जैसा कुछ दिखाई दिया। जिन्न ने पूछा- प्यारे अलादीन, शादी के बाद यूं तो सब परेशान रहते हैं, पर तेरी परेशानी कुछ ज्यादा वोल्टेज की लग रही है, क्या सेंसेक्स डूबने से तू व्यथित है? सेंसेक्स डूबने के बाद कई बंदे इधर डूबने आते हैं, पर अब यहां पानी नहीं बचा है। डूबने वाले पत्थर से टकरा जाते हैं, हाथ-पैर तुड़वा बैठते हैं। घर वाले डांटते हैं कि अगर मरना ही है, तो किसी मकान का लोन लेकर किसी बैंक के गुंडों के हाथों मरो ताकि कुछेक लाख का मुआवजा कोर्ट दिलवा दे। इतना शर्मदार तू है नहीं कि चुल्लू भर पानी में डूब जाए। वैसे जो शख्स आलू की ईएमआई अफोर्ड न कर पाए, उसे डूब मरना चाहिए पर चुल्लू भर पीने का पानी भी उस भाव होने लगा है कि उसकी ईएमआई भी तू अफोर्ड ना कर सकता।
खैर, बता तेरे लिए कोई हूर का जुगाड़मेंट करूं। मेरे पास हूरों को बुलाने की पावर है।
अलादीन हूरों का नाम सुनकर डर गया और पूछने लगा- ओफ्फो तो हूरों भी आलू खाएंगी। उनके आलुओं का पैसा कहां से आएगा। अबे जिन्न, हूर-शूर तलाशने के दिन गए। यह बता कि आलू का जुगाड़ तू कर सकता है क्या। जिन्न हंसने लगा और बोला- बेट्टा अब आलुओं की ईएमआई अफोर्ड करना अगर मेरे बूते में होता, तो काहे को डर कर मैं इस बोतल में रहता। घर जाते हुए शर्म आती है कि आलू तक अफोर्ड नहीं कर सकता। सो अब बोतल में रहता हूं। लेटेस्ट खबर यह है कि जिन्न को बोतल से निकालने की बजाय अलादीन खुद भी बोतल में घुसकर रहने का प्रयास कर रहा है।
-आलोक पुराणिक का लेखांश, नवभारत टाइम्स से साभार
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Monday, 26 November 2007
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