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Wednesday, 14 May 2008

शादीशुदा जिंदगी का मजा छीन लेते हैं बच्चे!

अपना परिवार बढ़ाना विवाहित जीवन का महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि बच्चे आने पर पति-पत्नी की जिंदगी और खुशहाल हो जाती है। लेकिन एक अध्ययन से इस पुरानी मान्यता के उलट निष्कर्ष मिल रहे हैं। एक शोधकर्ता ने दावा किया है कि शादीशुदा जिंदगी में बच्चों की गैरमौजूदगी ही खुशहाली का सबब है और बच्चे होने पर सारी खुशियां हवा हो जाती हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. डेनियल गिलबर्ट का कहना है कि शादीशुदा जिंदगी का मजा तभी तक है जब तक पति-पत्नी के बीच बच्चा नहीं आता है। पति-पत्नी अपनी खुशी तभी जी पाते हैं जब बच्चे घर से बाहर जा चुके होते हैं।

प्रो. गिलबर्ट का कहना है कि माता-पिता बच्चों पर वक्त और पैसे खर्च करते हैं। वे इसकी वापसी भी चाहते हैं। उनकी यह चाहत इस मान्यता की एक वजह बन जाती है कि बच्चे उनकी जिंदगी खुशगवार बनाते हैं। गिलबर्ट के अनुसार आंकड़े बताते हैं कि शादीशुदा लोग अविवाहितों, तलाकशुदा और अकेले रह रहे लोगों की अपेक्षा ज्यादा सुखी रहते हैं। शादीशुदा लोग न केवल लंबी जिंदगी जीते हैं, बल्कि यौन सुख का लुत्फ कुंवारों की तुलना में ज्यादा उठाते हैं। साथ ही वे प्रति व्यक्ति आय की तुलना में ज्यादा पैसा कमाते हैं। लेकिन जैसे ही उनके बच्चे होते हैं, सारी खुशी गायब हो जाती है। प्रोफेसर के मुताबिक बच्चा होने के बारे में सोचना खुशी देता है, लेकिन जब बच्चे हो जाते हैं तो परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आपके वैवाहिक सुख में खलल पड़ने लगता है। यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब बच्चे किशोरावस्था में पहुंचते हैं। प्रो. गिलबर्ट ने खुशी और इसके कारण विषय पर एक सेमिनार में ये बातें कहीं हैं।

Thursday, 10 April 2008

पति बढा़ते हैं, पत्नियों का काम

अगर आप सोचते हैं कि पतियों के कारण पत्नियों पर काम का बोझ बढ़ जाता है, या उन्हें घर में अधिक समय तक काम करना पड़ता है तो आप सही सोचते हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी के एक शोध में इस बात की पुष्टि हुई है। शोध में इस बात का खुलासा किया गया है कि शादीशुदा महिलाओं को अपने पतियों के कारण सप्ताह में औसतन सात घंटे घर का काम करना पड़ता है।

यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट फॉर सोशल रिसर्च (आईएसआर) विभाग के फ्रैंक स्टेफोर्ड ने कहा कि यह एक जाहिर सी बात है कि शादी के बाद बच्चे होने तक पुरुष बाहर के काम ज्यादा संभालते हैं, जबकि महिलाएं घर का काम संभालती हैं। लेकिन, महिलाओं के लिए स्थिति उस समय और बुरी हो जाती है जब उनके बच्चे हो जाते हैं।

स्टेफोर्ड की अध्यक्षता में किया गया शोध वर्ष 2005 की टाइम-डायरी आंकड़ों पर आधारित हैं। ये आंकड़े इंस्टिट्यूट फॉर सोशल रिसर्च विभाग में वर्ष 1968 से किए गए अध्ययन से जुटाए गए। बहरहाल, शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने के लिए डायरियों का अध्ययन किया कि लोग किस तरह अपना समय व्यतीत करते हैं। शोधकर्ताओं ने पुरुषों और महिलाओं से यह सवाल किया कि वे खाना बनाने, साफ-सफाई और घर के आस-पास कुछ अन्य काम पर कितना समय बिताते हैं।

अब भी दिल न भरा हो तो बाक़ी रिपोर्ट भी देख ही लें।