हर वह चीज, जो किसी के द्वारा सामने लायी जाती है, किसी न किसी को अवश्य मालूम रहती है। अब जैसे कि हिन्दू विवाह संस्कार में वर-वधू द्वारा लिए गए वचन, जो मुझे किसी लेख में मिले और जिन्हें यहाँ लिख रहा हूँ, बहुतेरों को मालूम होंगें लेकिन फिर भी कोई तो होगा ...
वर से लिए गए वचन
- ग़ृहस्थ जीवन में सुख-दुःख की स्थितियां आती रहती हैं, लेकिन तुम हमेशा अपना स्वभाव मधुर रखोगे।
- मुझे बताये बिना कुआँ - बावड़ी - तालाब का निर्माण, यज्ञ-महोत्सव का आयोजन और यात्रा नहीं करोगे।
- मेरे व्रत, दान और धर्म कार्यों में रोक-टोक नहीं करोगे।
- मेहनत से जो कुछ भी अर्जित करो, मुझे सौंपोगे।
- मेरी राय के बिना कोई भी चल-अचल सम्पति का क्रय-विक्रय नहीं करोगे।
- घर की सभी कीमती चीजें, गहने, आभूषण मुझे रखने के लिए दोगे।
- माता-पिता के किसी आयोजन में मेरे जाने पर आपत्ति नहीं करोगे।
- मेरी अनुपस्थिति में कहीं नहीं जायोगी।
- विष्णु, वैश्वानर, ब्राह्मण, मेहमान और परिजन सभी साक्षी हैं कि मैं तुम्हारा हो चुका हूँ।
- मेरे मन में तुम्हारा मन रहे। तुम्हारी बातों में मेरी बातें रहें और मुझे अपने ह्रदय में रखोगी
- मेरी इच्छायोँ और आज्ञायोँ का निरादर नहीं करोगी और बडों का सम्मान करोगी।
- हमेशा मेरी विश्वसनीय बनी रहोगी।

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