बहुत समय पहले, विवाह के बाद कुछ वर्ष बाद तक डायरी लिखने की आदत थी।
अपने स्वतंत्र विचार, किसी भी संदर्भ में, लिख छोड़ता था।
ज़ाहिर है, पत्नियों (सारे संसार की!) के बारे में भी कुछ था ही।
बस एक दिन, वह डायरी लग गयी, 'उनके' हाथ।
… और मचा वो तांडव कि हमने डायरी को तुरंत लगा दी आग, यह कहकर कि 'सोच लेना कि इस डायरी के साथ मैं भी चला गया'
लेकिन ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है।
पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लगा, अरे मै तो अभी जीवित हूँ।
बस यह ब्लॉग बना डाला।
सिर ओखली में फिर दे दिया है, देखें कैसे-कैसे मूसलों का सामना होता है।
Wednesday, 27 June, 2007
इस ब्लॉग का औचित्य
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