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Thursday, 11 March 2010

मनचाही सब्जी के लिए पुरुषों को घर में 33 प्रतिशत आरक्षण मिले!!

महिला आरक्षण विधेयक पर चुटकियां लेते हुए हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने कहा है कि महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक पास हो गया है। अब जरूरत है कि पुरुषों को घर में भी 33 प्रतिशत आरक्षण मिले, क्योंकि अभी तक पत्नी का 100 प्रतिशत दबाव रहता है। पत्नी की अनुमति के बगैर पति मनचाही सब्जी खाना तो दूर अपने मन मुताबिक कपड़े भी नहीं पहन पाता।

लखनऊ में एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने आये कवि सुरेंद्र शर्मा ने महिला आरक्षण पर कहा कि महिला आरक्षण से संसद में या तो इंदिरा गांधी जैसी महिला पहुंचेगी या फिर फूलनदेवी। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र की इकलौती शख्सियत रह चुकी हैं। ऐसी ही महिलाओं की देश को जरूरत है।

Tuesday, 23 February 2010

कोई भी सफल महिला अपने घर से लड़कर सफल नहीं हुई बल्कि परिवार का साथ पाकर ही सफल बनी है

आज के अखबार में खबर पढ़ी। कुछ अनोखी सी लगी। अनोखी इसलिए कि अपने प्रदेश में नामी वकील रहीं और अब रायपुर की मेयर बनीं किरणमयी नायक ने जो कुछ कहा वह आज की कथित प्रगतिशील महिलाओं को शायद हजम ना हो।

कल आयोजित किए गए एक दिवसीय कार्यशाला में नुख्य अतिथि की आसंदी से रायपुर निगम की महापौर किरणमयी नायक ने कहा कि किस्सा यहाँ एक के साथ चार फ़्री का है! दहेज की रिपोर्ट दर्ज कराते वक्त महिलाएं इस मुगालते में रहती हैं कि बस रिपोर्ट दर्ज कराई और ससुराल वालों को सजा मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता। वह दहेज की एक रिपोर्ट लिखवाती है और बदले में उसे चार केस भुगतने पड़ते हैं यानि तलाक, मेंटेनेंस, संपत्ति में अधिकार और बच्चे हैं तो उसकी गार्जनशिप का मामला भी उसे फेस करने होते हैं। अकेले परिवार की जिद और सास-ससुर को नहीं रखने वाली महिला कहीं की नहीं रह जाती और दहेज का मामला दायर करने के बाद वह वापस भी नहीं जा पाती। उन्होंने महिलाओं से कहा कि अपने घर को जोड़कर रखें न कि अपने घर के मामले को पुलिस थाने तक ले कर जाएं। उन्होंने कहा कि कोई भी सफल महिला अपने घर से लड़कर सफल नहीं हुई बल्कि परिवार का साथ पाकर ही सफल बनी है, इसलिए अपने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों को निभाना सीखें।

कुछ अनोखा नहीं लगा आपको?

Monday, 25 August 2008

मैंने किसी की माँ की... किसी की पत्नी की... नहीं की है।

पिछले दिनों एक ब्लॉगर साथी की अच्छी, सामयिक, सुलझी हुयी पोस्ट उनकी सुपुत्री के सौजन्य से पढ़ने को मिली। दैनंदिन व्यस्ततायों के चलते हर पोस्ट पर दो-चार शब्दों से अधिक वाली टिप्पणी कर पाना सम्भव नहीं होता। लेकिन इस कन्या भ्रूण ह्त्या और दहेज़ जैसी सामाजिक बुराई की ओर इशारा करती पोस्ट पर कतिपय नारी समर्थक सामूहिक ब्लॉग की ओर इशारा करने के साथ-साथ मैंने एक विचार भी रख दिया। हालांकि उसके पहले भी सच की टिप्पणी कुछ इसी तरह की थी

मेरी दी गयी टिप्पणी में बस इतना ही कौतूहल था कि ... कोई जानी-पहचानी प्रतिक्रिया क्यों नहीं आयी! मेरा इतना लिखना भर ही काफी साबित हुया बवाल मचाने के लिए।


पढ़ने वालों को, बिना शब्दों पर ध्यान दिए, ऐसा लगा मानो मैंने आधी सृष्टि को चुनौती दे दी हो कि कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आयी। फिर क्या था, आंकड़े प्रस्तुत किए गए, द्विवेदी जी को 'प्रेरित' किया गया कि वे पतिनुमा प्राणी को बता दें ... अपशब्दों का प्रयोग करना बंद करें
मैं हैरत में पड़ गया! अपशब्द !? ये अपशब्द मैंने कहाँ लिख दिए? ज्ञात होते हुए भी, जिन शब्दों का मौखिक-लिखित-मानसिक-वैचारिक उपयोग कभी नहीं किया, उनके प्रयोग का आरोप! इन माननीया को यदि कभी, वास्तविकता में अपशब्दों का सामना करना पड़ा जाए तो क्या करेंगीं? हालांकि इनका दावा इनके कमेन्ट फॉर्म पर है कि इसी बात को इंगित करते हुए मेरी दूसरी टिप्पणी इस निवेदन के साथ गयी कि द्विवेदी जी के ब्लॉग पर, इन औचित्यहीन बातों पर तो कोई तुक नहीं। उनसे क्षमा चाहता हूँ। ... अनुरोध है कि वे अपने या मेरे ब्लॉग पर ही अपनी बात रखें।

द्विवेदी जी ने पता नहीं क्या सोचकर उन टिप्पणियों को 'उड़ा' दिया। फिर पता नहीं किन परिस्थितियों में, मूल आलेख से ध्यान हटाते हुए 'उन' टिप्पणियों पर आधारित एक पोस्ट ही लिख मारी। जिसमें एक तरह से सफाई पेश की
और मेरा परिचय कराते हुए उन्होंने मेरी माँ, बच्चों , पत्नी, यहाँ तक कि भगवान को भी लपेट लिया! माता जी से नाराज ...कि जन्म ही क्यों दिया? ...अठारवीं शताब्दी में नम्बर लगाया था, पैदा किया बीसवीं के उत्तरार्ध में... ...जरूरत थी एक संतान की, पैदा हो गईं दो... ...एक पाप कर डाला, ब्याह कर लिया। ...पैदा करने में भगवान जी ने जो देरी की, उस के नतीजे में पाला पड़ा ऐसी पत्नी से जो आकांक्षा रखती है। ...कुछ कहें तो बराबर की बजातीं है।


मैं तो दंग रह गया! सोचने लगा कि क्या अपशब्दों के लिए अंग-विशेष से जुड़े किन्हीं खास शब्दों की जरूरत होती है। उनकी पोस्ट ख़त्म होते-होते लगा कि वे अपने लिए ही कह रहें हों कि भड़ास निकालने वाले को रोकने पर उसे कितनी परेशानी होती है? सोच भी नहीं सकते। सोचने की जरूरत भी नहीं। मैंने सोचना बंद कर लिखना शरू कर दिया।

इसी बीच
द्विवेदी जी की पोस्ट पर अनुराग जी की टिप्पणी आयी क्या आपसे वैचारिक असहमति रखना ही नारी विरोधी होना है? जब आप वहां वैचारिक असहमति जताते है तो बहस मुड जाती है ,अपने मुद्दे से भटक जाती है ... हर मुद्दे को स्त्री ओर पुरूष के चश्मे से नही देखना चाहिए ... तो द्विवेदी जी का जवाब गया ...विमर्श में कोई बुरका पहन कर नहीं आता। जब मैंने सच का ब्लॉग देखना चाहा तो पाया कि वहाँ तो बुर्के की आवश्यकता भी नहीं है।

सच ने फिर एक प्रश्न उछाला: मैंने तो बस इतना पूछा था कि पुरवा के ...लेख पर सब ने एक सुर से सही का निशाँ लगाया क्योकि उसके पिता के ब्लॉग पर ये लेख था। अन्य ब्लॉग पर अगर स्त्री विमर्श होता हैं तो गालियाँ और अपशब्दों की टिप्पणी होती हैं। ये भेद भाव क्यों ??

और उसके बाद आने वाली टिप्पणियाँ कैसी आयीं देखिये
अरविन्द मिश्रा - अब यह विमर्श डेंजर ज़ोन में जा रहा है ...फूट लेना ही बेहतर !
उड़न तश्तरी - बड़ी पेंच है भाई -चलते हैं!!
सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी- पढ़ो और फूट लो भाई... माहौल गर्म है।
ज्ञानदत्त पाण्डेय- यहां बोलना खतरे जान है! :-)

इन सबके बीच जब सच ने मुझे संबोधित कर लिखा कि आप को दिवेदी जी की बेटी की पोस्ट पर आप को कोई ओब्जेक्शन नहीं हुआ। तो तरस भी आया कि उसमें ऐसा क्या था जिस पर पर मैं आपत्ति उठाता? वैसे वैचारिक मतभेद के रूप में अपने विचार तो रख ही दिए थे कि ... आलेख में मूल तौर पर दहेज को कारक माना गया है। लेकिन उन परिवारों में, जहाँ दहेज कोई मायने नहीं रखता, वहाँ भी तो यही हाल है।

जब प्रेमचंद जी का उद्धरण दिया गया कि पुरूष, स्त्री के गुण अपना ले तो देवता बन जाता है और स्त्री, पुरूषों के गुण अपना ले तो कुलटा कहलाती है। तो अफसोस फिर हुया कि हमारे साथी शब्दों पर ध्यान क्यों नहीं देते!
कुलटा बनने/होने और कहलाने में बहुत फर्क है।


इस पोस्ट को लिखते-लिखते द्विवेदी जी की नयी पोस्ट पर नज़र पडी। लगा, कुछ नया पढ़ने को मिलेगा, लेकिन फिर वही राग। समझ में नहीं आया तिलमिला कौन रहा है? जब उनका भी यही सोचना है कि महिलाएँ संऱक्षण के बावजूद भी अपशब्द का शिकार होंगी, तो विलाप किस बात का? जब उन जैसा व्यक्ति भी मेरी सामान्य सी भाषा को, रस्सी को पत्थर पर रगड़-रगड़ कर, अपशब्द ठहराने पर तुला हुया हो तो कुछ कहना ही बेमानी है। हाँ, वे आत्मस्वीकृतिनुमा भाषा का प्रयोग करते हुए कहतें है ...जब वे (महिलायें) हासिल कर चुकी होती हैं, तो अन्य को भी प्रेरित करती हैं। कानून और प्रत्यक्ष ऱूप से पुरुषों को भी उन का साथ देना होता है।

इसी बीच पति-पत्नी ब्लॉग पर बांयीं और के मैसेज बॉक्स में किन्हीं संजय द्विवेदी जी का प्रश्न दिखा 'आपकी बीबी ने अभी तक यह ब्लॉग पढ़ा नही है क्या ?' तो लगा कि एक खौफज़दा पर, बीबी का हौव्वा इतना भारी है कि दूसरों को भी धमका रहे हैं!

इन सभी औचित्यहीन बातों के बाद भी, मुझे अभी भी उम्मीद है कि उनके प्रेरणा स्त्रोत ओर वे, मेरी पहली टिप्पणी पर समय देंगें ओर स्वस्थ विचार-विमर्श के लिए रास्ता खुला रखेंगें। टिप्पणियों को ऐसे ही लें जैसे गुलाब के साथ कांटे, न कि काँटों पर ध्यान देते-देते गुलाब का आनंद खो दें। जिस आलेख पर टिप्पणी के कारण इस पोस्ट के लिखे जाने की नौबत आयी है, नि:संदेह एक अच्छा प्रयास है, आंकडों और तथ्यों की रोशनी में। अच्छे प्रयासों की तारीफ होनी ही चाहिए, लेकिन 'प्रेरित' द्विवेदी जी द्वारा व्यक्तिगत प्रहार किए जाने से पूरा आनन्द ही जाता रहा। मुझे अंदेशा है कि वे मुझे जानते हैं। यदि नहीं तो, कोशिश करूंगा, उन्हें मेरा वास्तविक परिचय न मिल पाये।

संतुलित लेखन के बावजूद, यदि किसी को लगता है कि ये 'हिट बेलो बेल्ट' है तो ध्यान दें कि अधिकतर शब्द मेरे नहीं हैं, आप ही के हैं! मैंने किसी की माँ की... किसी की बेटी की... किसी के परिवार की... किसी की पत्नी की... किसी के भगवान की कोई बात नहीं की है।

Thursday, 21 August 2008

पुरूषों की लंबी उम्र के लिए बेहतर है एक से ज्यादा बीवियां!

अभी अभी एक ब्लॉगर साथी ने अपनी पोस्ट में ऐलान किया है कि ब्याह करना पाप है! लेकिन एक हालिया शोध का निष्कर्ष है कि एक से ज्यादा पत्नियां रखने वाले पुरुष लंबी उम्र पाते हैं। प्रमुख शोधकर्ता विरपी लुम्मा के मुताबिक एकपत्नी प्रथा पर अमल करने वाले 49 देशों के पुरुषों की तुलना में बहुपत्नी प्रथा वाले 140 देशों में 60 साल से ज्यादा उम्र के पुरुष 12 फीसदी ज्यादा जीते हैं। लंबे अरसे से वैज्ञानिक मानव जीवविज्ञान की इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे कि पुरुष लंबी उम्र तक क्यों जीते हैं? बहुपत्नी प्रथा इस प्रश्न को सुलझाने में अहम साबित हुई है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक महिलाओं की लंबी उम्र का राज उनकी रजोनिवृत्ति में छुपा होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो मासिक धर्म खत्म हो जाने के बाद महिलाएं ज्यादा जीती हैं। रजोनिवृत्त महिलाओं की लंबी उम्र को लुम्मा 'दादी मां प्रभाव' बताती हैं। वह कहती हैं कि रजोनिवृत्ति के बाद कोई महिला दस साल जीती है तो उसे दो अतिरिक्त पोते-पोतियों को प्यार-दुलार करने का मौका मिलता है। शोध में महिलाओं की लंबी उम्र के पीछे पोते-पोतियों को दुलार करना तथा उनके नाज-नखरे सहने को एक बड़ा कारण बताया गया है। लेकिन पुरुषों का जीव विज्ञान महिलाओं से भिन्न होता है। वे 80 साल के बाद भी यौन क्रिया में हिस्सा ले सकते हैं। ज्यादातर अनुसंधानकर्ता इसी बात को मर्दो की लंबी जिंदगी का राज बताते हैं।

वैज्ञानिकों ने दादी मां प्रभाव की तरह पुरुषों में 'दादा प्रभाव' का अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने 18वीं और 19वीं सदी के 25,000 फिनलैंडवासियोंके रिकार्ड खंगाले। इनमें से ज्यादातर लोग अपेक्षाकृत कम दिन जीवित पाए गए। यह वह दौर था जब लोग स्थान परिवर्तन कम करने के साथ परिवार नियोजन के तरीके भी नहीं अपनाते थे। चर्च की तरफ से एकपत्नी प्रथा कठोरता से लागू थी। पत्नी की मृत्यु के बाद ही पुरुष दूसरी शादी कर सकते थे।

Friday, 11 April 2008

पाकिस्तान में तलाक लेने में महिलाएं आगे

पाकिस्तान में इन दिनों परिवार अदालतों के बाहर तलाक लेने वालों की कतार लंबी ही होती जा रही है। तलाक के कारण भी ऐसे-ऐसे बताए जा रहे हैं, जो हैरान करने वाले हैं। रावलपिंडी की 33 परिवार अदालतों में इस साल करीब डेढ़ हजार लोग तलाक की अर्जी दे चुके हैं। इनमें से 270 को तलाक मिल भी चुका है। 778 अर्जियों पर फैसला आना बाकी है।

तलाक के कारणों पर गौर करें तो दहेज की मांग और ससुराल पक्ष द्वारा बदसलूकी सबसे आम कारण हैं। पर कुछ अजीबोगरीब कारण भी बताए गए हैं, जैसे- सेलफोन का बहुत ज्यादा इस्तेमाल या कंप्यूटर पर काम करने की मनाही आदि। खास बात यह है कि तलाक मांगने वालों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है।

दैनिक जागरण के एक समाचार में बताया गया है कि शादी के तीन महीने बाद ही तलाक की अर्जी दायर कर चुकी एक लड़की लगातार की जा रही दहेज की मांग को रिश्ते टूटने का एक प्रमुख कारण बताती है। 300 महिलाओं ने जहां अपने पति द्वारा दूसरी शादी की इच्छा को तलाक का कारण बताया है, वहीं 150 महिलाओं ने अपनी सास के दुर्व्यवहार को। कुछ महिलाओं ने अपनी आर्थिक परेशानियों के मद्देनजर तलाक मांगा है। सौ से ज्यादा महिलाओं द्वारा दायर तलाक के आवेदनों में कहा गया है कि उनके शौहर के पास नौकरी नहीं है, इसलिए वह उनके साथ नहीं रह सकतीं। कुछ ने तो यह कहा है कि उनका पति उनके साथ वक्त नहीं बिताता और रात भर किसी अजनबी से मोबाइल पर बात करता रहता है। और तो और 23 जोड़ों ने तो सिर्फ इसलिए तलाक मांगा है, क्योंकि उनकी जोड़ी बेमेल है।

Sunday, 20 January 2008

वश में हो, तो तलाक ले लेंगी ज्यादातर महिलाएं

मेरे ख्याल से यह स्थिति तो हर जगह होगी जैसी ब्रिटेन में पायी गयी है, जहाँ ज्यादातर शादीशुदा ब्रिटिश महिलाओं का वश चले तो वे अपने पति से तलाक लेना पसंद करेंगी। एक सर्वे में यह बात सामने आई है।

शादीशुदा पुरुषों और महिलाओं पर सर्वे में 59 फीसदी महिलाओं ने कहा कि अगर भविष्य में आर्थिक सुरक्षा तय हो, तो तुरंत तलाक ले लेंगी। महिलाओं और पुरुषों दोनों में 10 में से एक का कहना था कि काश मैंने किसी और से शादी की होती। सर्वे के मुताबिक, आधे से ज्यादा पति अपनी शादीशुदा जिंदगी में प्यार का अभाव मानते हैं।

इस सर्वे में 2000 वयस्क ब्रिटिश शामिल किए गए। इनमें करीब 30 फीसदी ने अपनी शादी को नाकाम माना और कहा कि अचानक जिंदगी में उथल-पुथल से बचने के लिए शादी के बंधन को निभा रहे हैं। महिलाओं और पुरुषों में करीब आधे ने कहा कि परिवार को बिखरने से बचाने के लिए हम साथ रह रहे हैं। 30 फीसदी पुरुषों का कहना था कि हम अपने बच्चों की खातिर साथ रह रहे हैं। 56 फीसदी लोगों ने माना कि अपने वैवाहिक रिश्तों से पूरी तरह खुश नहीं हैं। आधे से ज्यादा लोगों ने कहा कि हमने तलाक लेने पर विचार किया था।

Wednesday, 5 December 2007

पापा परिवार का हिस्सा नहीं !

कहते हैं बच्चों के लिए माता-पिता ही भगवान का एक रुप होते हैं। बच्चों को जहां मां का दुलार चाहिए वहीं पिता के प्यार और सहारे की भी जरुरत होती है।

लेकिन इससे उलट लंदन में किए गए एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि चार में से एक बच्चा अपने पिता को परिवार का हिस्सा नहीं मानता।

सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन में बच्चे अपनी मां को तो जानते हैं लेकिन पिता इस सुख से कोसों दूर हैं। तकरीबन 96 प्रतिशत बच्चे अपनी मां को मौजूदा परिवार का प्रमुख हिस्सा मानते हैं, जबकि 26 प्रतिशत बच्चे पिता को परिवार का अंग भी नहीं मानते।

'वार्ता' की खबर में दिए गए सर्वेक्षण की मानें तो एक-चौथाई बच्चों को अपने पिता की पारिवारिक भूमिका के बारे में कुछ पता ही नहीं हैं। यह सर्वेक्षण छह से 12 साल तक की उम्र वाले बच्चों पर किया गया था।