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Thursday, 11 March 2010

मनचाही सब्जी के लिए पुरुषों को घर में 33 प्रतिशत आरक्षण मिले!!

महिला आरक्षण विधेयक पर चुटकियां लेते हुए हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने कहा है कि महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक पास हो गया है। अब जरूरत है कि पुरुषों को घर में भी 33 प्रतिशत आरक्षण मिले, क्योंकि अभी तक पत्नी का 100 प्रतिशत दबाव रहता है। पत्नी की अनुमति के बगैर पति मनचाही सब्जी खाना तो दूर अपने मन मुताबिक कपड़े भी नहीं पहन पाता।

लखनऊ में एक कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने आये कवि सुरेंद्र शर्मा ने महिला आरक्षण पर कहा कि महिला आरक्षण से संसद में या तो इंदिरा गांधी जैसी महिला पहुंचेगी या फिर फूलनदेवी। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र की इकलौती शख्सियत रह चुकी हैं। ऐसी ही महिलाओं की देश को जरूरत है।

Monday, 8 March 2010

पांच माह की गर्भवती महिला ने पति को मगरमच्छ के मुंह से बचाया

आज महिला दिवस पर एक महिला के साहस की अनोखी खबर मिली। हुआ यह कि डरबन के लॉरैंस मुनरो और उसकी पत्नी कैरिन शहर से 125 मील दूर इमफोलोजी गेम रिजर्व में व्हाइट उमफोल्जी नदी के तट पर घूम रहे थे। तभी उन्होंने चट्टानों पर आराम करने की सोची। थोड़ी देर बाद जैसे ही लॉरैंस नदी में अपने पैर धोने गया, एक मगरमच्छ ने उस पर हमला कर दिया और पैर मुंह में ले लिया।

33 वर्षीय लॉरैंस ने कहा, वह बस कुछ ही पलों की बात थी। मैं चट्टानों को पकड़कर अपने दाएं पैर से मगरमच्छ को धकेलने लगा। एक बार तो उसने मुझे छोड़ दिया लेकिन फिर दोनों पैरों को दबोच लिया। मैंने अपनी राइफल पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह मुझे खींचकर पानी के पास ले गया। इसके बाद केरिन ने मुझे बाजू से खींचना शुरू कर दिया।

आखिरकार इस संघर्ष में केरिन जीत गई और उसने मुझे मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त कराया।

पांच माह की गर्भवती केरिन इतनी मेहनत के बाद अस्पताल में आराम कर रही है। लॉरैंस, केरिन जैसी पत्नी पाकर बहुत खुश है। मगरमच्छ उसे खा भी सकता था। मगरमच्छ 9.8 फीट लंबा रहा होगा लेकिन अंत में उसने संघर्ष बंद कर दिया।

Tuesday, 23 February 2010

कोई भी सफल महिला अपने घर से लड़कर सफल नहीं हुई बल्कि परिवार का साथ पाकर ही सफल बनी है

आज के अखबार में खबर पढ़ी। कुछ अनोखी सी लगी। अनोखी इसलिए कि अपने प्रदेश में नामी वकील रहीं और अब रायपुर की मेयर बनीं किरणमयी नायक ने जो कुछ कहा वह आज की कथित प्रगतिशील महिलाओं को शायद हजम ना हो।

कल आयोजित किए गए एक दिवसीय कार्यशाला में नुख्य अतिथि की आसंदी से रायपुर निगम की महापौर किरणमयी नायक ने कहा कि किस्सा यहाँ एक के साथ चार फ़्री का है! दहेज की रिपोर्ट दर्ज कराते वक्त महिलाएं इस मुगालते में रहती हैं कि बस रिपोर्ट दर्ज कराई और ससुराल वालों को सजा मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होता। वह दहेज की एक रिपोर्ट लिखवाती है और बदले में उसे चार केस भुगतने पड़ते हैं यानि तलाक, मेंटेनेंस, संपत्ति में अधिकार और बच्चे हैं तो उसकी गार्जनशिप का मामला भी उसे फेस करने होते हैं। अकेले परिवार की जिद और सास-ससुर को नहीं रखने वाली महिला कहीं की नहीं रह जाती और दहेज का मामला दायर करने के बाद वह वापस भी नहीं जा पाती। उन्होंने महिलाओं से कहा कि अपने घर को जोड़कर रखें न कि अपने घर के मामले को पुलिस थाने तक ले कर जाएं। उन्होंने कहा कि कोई भी सफल महिला अपने घर से लड़कर सफल नहीं हुई बल्कि परिवार का साथ पाकर ही सफल बनी है, इसलिए अपने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों को निभाना सीखें।

कुछ अनोखा नहीं लगा आपको?

Sunday, 20 December 2009

एक महिला, सताये गए पतियों के लिए लड़ रही: कहती है कि पति भी आखिर इंसान हैं

पतियों से पीडित पत्नियों के हक के लिये कई संगठन संघर्ष कर रहे हैं लेकिन पत्नियों के हाथों सताये गये पतियों के हक में लडाई लडने के लिये आल इंडिया फॉरगौटेन वुमेन. बनाया गया है । इस संगठन की अध्यक्षा उमा चल्ला का कहना है कि हर दिन पतियों एवं उनके परिवार वालों के खिलाफ अनेक फर्जी मामले देश भर में दर्ज किये जा रहे हैं और फर्जी शिकायतों के आधार पर निर्दोष पुरूषों एवं उनके सगे.संबधियों को जेलों में डाला जा रहा है। यह संगठन न केवल पतियों के बल्कि पत्नियों एवं सास के हकों के लिये भी संघर्ष कर रहा है।

श्रीमती उमा ने कहा कि उनके संगठन का लक्ष्य लैंगिक विषमताओं एवं भेदभाव से उपर उठकर हर किसी के हितों की रक्षा के लिये संघर्ष करना है। उन्होंने बताया कि संगठन ने अपने अध्ययन के दौरान पाया कि घरों में छोटे.मोटे झगडों एवं मनमुनाव के बाद कई महिलायें अपने पतियों एवं सास.श्वसुर को ब्लैकमेल करती है।

Wednesday, 25 November 2009

पैसे लेकर वह महिलाओं से खुद को पिटवाता है!!

भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव होना आम है। इसका शिकार पुरुष भी हो सकते हैं और स्त्रियां भी। जो चूल्हा-चौके में ही खप रही हैं, उन्हें इस बात का तनाव है कि नौकरी नहीं करती हैं। जो नौकरी करती हैं उनकी परेशानी यह है कि बाहर के साथ घर की देखभाल भी करनी पड़ रही है। कई बार उनके गुस्से के शिकार उनके बच्चे होते हैं।

कैसा हो अगर ऐसी महिलाओं को अपना गुस्सा उतारने के लिए किराए पर एक जीता-जागता आदमी मिल जाए, और उसे मारकर वह अपनी भड़ास निकालें। उत्तर-पूर्वी चीन के शेनयांग में तो एक शख्स ने यह सेवा शुरू भी कर दी है। वह पैसे लेकर महिलाओं से खुद को पिटवाता है।

जियाओ लिन नाम का यह शख्स एक जिम का कोच है। उसने तनावग्रस्त महिलाओं को अपनी भड़ास निकालने के लिए खुद को एक पंचबैग (मुक्के मारने वाला बैग) की तरह इस्तेमाल करने के लिए पेश किया है। लिन को मारने के लिए महिलाओं को एक कीमत अदा करनी पड़ती है। अपने इस नए कारोबार के बारे में उसने अपने परिवार को नहीं बताया है।

बकौल लिन, मैं दिन में जिम में लोगों को प्रशिक्षण देता हूं। शाम को मैं ये अंशकालिक काम करता हूं। इस काम के लिए मुझे और भी साथियों की तलाश है। मुझसे अगर कोई जुड़ना चाहे तो उसका स्वागत है। लिन अपने इस पेशे से काफी रोमांचित हैं।

उन्होंने कहा, महिलाओं के लिए पंचबैग बनकर मैं कुछ पैसे भी कमा लेता हूं। इसके साथ-साथ खुद को बचाने की कला में भी मुझे निपुणता हासिल हो रही है। ऐसा करने में मेरा शारीरिक नुकसान भी नहीं है। ये जनाब आधे घंटे तक पिटने के लिए 100 युआन (करीब 700 रुपये) लेते हैं। इस सेवा का लाभ उठाने के लिए उनके पास ग्राहक भी आने लगी हैं।

लिन के अनुसार, उनकी पहली ग्राहक 25 साल की लड़की है। उसने आधा घंटे की कीमत अदा की। लेकिन वो जल्द ही थक गई। उसने बाकी समय मेरे साथ बातचीत करके निकाला।

दूसरी ग्राहक भी ऐसी ही थी। वो भी जल्द ही थक गई। लेकिन मुझे पीटने के बाद दोनों ही बहुत संतुष्ट दिखाई दीं। उनका कहना है कि ऐसा करके वह तनावग्रस्त महिलाओं की मदद कर रहे हैं।

Saturday, 11 July 2009

संतान प्राप्ति के लिए सुंदर पुरुष के बदले बदसूरत पुरूष बेहतर

संतानोपत्ति से जुड़े मुद्दों पर आ गई एक और रिपोर्ट. यह अलग सी रिपोर्ट बताती है कि आकर्षक या सुंदर पुरुष की बच्चे पैदा करने की कूवत, कुरूप या अच्छे न दिखने वाले पुरुषों की तुलना में कम होती है।

इस रिपोर्ट के पीछे जो तर्क रखा गया है उसके मुताबिक आकर्षक पुरुष प्रणय क्रीड़ा के दौरान कुरूप या कम आकर्षक पुरुषों की तुलना में कम शुक्राणु छोड़ते हैं. यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन और दुनिया की मशहूर यूनिवर्सिटी ऑक्सफोर्ड ने यह परिणाम निकाला है ।

रिपोर्ट की खबर यहाँ मौजूद है.

Wednesday, 31 December 2008

Wednesday, 5 November 2008

बीबी के चेहरे पर इतने मुहाँसे, कि पति ने तलाक ले लिया

मुंबई में एक पति को अपनी बीवी के चेहरे के मुँहासों से इतनी नफरत हुई कि उसने पत्नी से ही तलाक ले लिया। भले ही उसे हर्जाने के तौर पर ढाई लाख रुपये चुकाने पड़े। हुया यह कि सीमा (बदला हुआ नाम) के पति ने कोर्ट में अर्जी दायर कर कहा कि उसकी पत्नी के चेहरे पर मुँहासों के दाग हैं। इन दागों की वजह से वह अपनी पत्नी के साथ हनीमून का आनंद नहीं ले सका। अश्विन ने कहा कि उसकी पत्नी को यह त्वचा संबंधी बीमारी बचपन से थी, लेकिन शादी के समय ससुरालवालों ने इस बात को छुपाया।

हनीमून के बाद सीमा से कहा गया कि तुम अपने मायके जाकर अपने डॉक्टर की सलाह ले। इसके एक महीने बाद सीमा अपने मायके लौट गई। उस वक्त पति ने उसे विश्वास दिलाया था कि जब वह ठीक हो जाएगी, तो वह उसे फिर उसे बुला लेगा। मई 1998 में सीमा ने अपने पति को फोन किया और धमकी दी कि अगर उसने उसे अपने पास नहीं बुलाया तो वह खुदकुशी कर लेगी। इसी बीच सीमा ने थाने में जाकर ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। जब मामला मुंबई की पारिवारिक अदालत पहुंचा तो अदालत ने सीमा के डॉक्टर को अदालत में पेश होने के लिए कहा। सीमा के डॉक्टर ने कहा कि इस बीमारी का उपचार है और यह ठीक हो सकती है। साथ ही उसने कोर्ट से कहा कि इसके चलते शारीरिक सम्बन्ध बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। पर अदालत ने डॉक्टर की दलील को नकार दिया।

6 साल तक कोर्ट में मामला चलने के बाद दोनों पक्ष तलाक के लिए तैयार हो गए। सीमा को अपने पति के खिलाफ कोर्ट में दायर सभी केस को वापस लेने के लिए 2.50 लाख रुपये हर्जाना भी दिया गया।

Sunday, 19 October 2008

शेयर बाजार में 30 लाख रुपए लुटा बैठी, पति ने तलाक देने का फैसला लिया

एक महिला को उसके पति ने तलाक देने का इसलिए फैसला कर लिया क्योंकि वह शेयर बाजार में 30 लाख रुपए लुटा बैठी। लगता है कि आर्थिक मंदी की छाया शेयर बाजार से निकलकर घर की चारदीवारी में पसर गई है। अहमदाबाद के मनोविज्ञानी डॉ . हंसल भचेच की ऑनलाइन कंसल्टेंसी में इस महिला ने अपना दिल का हाल बयां किया है। वह एक गृहणी है और खाली समय में शेयर ट्रेडिंग किया करती है। उसने बिना अपना नाम बताए लिखा है , ' मैं 34 साल की हूं और मेरी शादी को 10 साल हुए हैं। मेरी एक बेटी है जो अब बड़ी हो गई है। इसीलिए मेरे पास अब इतना समय होता है कि मैं घर बैठे कुछ काम कर सकूं। शेयर मार्केट में पैसा लगाना मुझे सबसे मुफीद लगा , सो मैं यह काम करने लगी। '

महिला आगे लिखती है , ' जब मुझे मुनाफा हुआ तो मेरे पति को भी यह बहुत अच्छा लगा। एक समय ऐसा भी था कि हमारे परिवार पर रुपयों की बरसात हुई। सारे सपने पूरे हो जाएंगे , ऐसा लगा। पर हाल के दिनों में जब शेयर मार्केट बुरी तरह गिरे , तो मुझे बहुत नुकसान हुआ। मेरे पति बहुत नाराज हुए। उन्होंने साफ कह दिया कि वह इस घाटे को नहीं उठा सकते। उन्होंने मुझे तलाक देने की धमकी भी दी है। ' डॉ . भचेच से राय मांगते हुए उस महिला ने पूछा है कि शेयर मार्केट की इस स्थिति के लिए सरकार क्या करने वाली है ?' वैसे अहमदाबाद की बहुत सी घरेलू महिलाओं ने पिछले कुछ हफ्तों में स्टॉक्स में बड़ी रकम गंवाई है। यह बात अलग है कि यह अपनी तरह का मामला है पर इसमें कोई शक नहीं कि बहुत सी महिलाएं इस समय दोहरे दर्द को झेल रही हैं। पैसे गंवाने के साथ - साथ उन्हें परिवार से भी ताने सुनने को मिल रहे हैं ,' डॉ . भचेच यह कहते हैं।
(ख़बर, विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा)

महिलाओं की पसंद हैं, पुराने ख्याल के देसी मर्द

महिलाओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए पुरुषों को यह दावा करने की जरूरत नहीं कि वे बहुत समानतावादी हैं और लिंग के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं मानते। सर्वे कहता है कि ज्यादातर पुरुष हकीकत में पारंपरिक बीवी चाहते हैं और औरतों को भी ऐसे पुरुषों को उपकृत करने में मजा आता है। यानी आज भी औरतें मेट्रोसेक्सुअल के बजाय देसी तेवर वाले रेट्रोसेक्सुअल युवकों को ही ज्यादा तरजीह देती हैं।

यॉर्कशर बिल्डिंग सोसाइटी में हुए शोध के मुताबिक ज्यादातर औरतें आज भी जीवनसाथी चुनते समय पुराने ख्यालों वाले, सुरक्षा का एहसास दिलाने वाले पुरुषों का चुनाव करती हैं। सर्वे के मुताबिक औरतों को ऐसे पुरुष ज्यादा पसंद हैं जो घर और बाहर परंपरागत भूमिका में रहते हैं और आक्रामक रुख अपनाते हैं। इसके बजाय घर में रहने, समझदार रवैया दिखाने वाले मेट्रोसेक्सुअल तेवर औरत को शादी के बंधन में बांधने के लिए नाकाफी होते हैं।

इसके अलावा औरतों में नौकरी का आग्रह भी काफी कम होता जा रहा है। उन्हें लगता है कि करियर बनाने के फेर में भाग-दौड़ करने से अच्छा है कि बच्चों और परिवार की देखभाल की जाए। जब पुरुषों से पूछा गया कि जीवनसाथी में सबसे महत्वपूर्ण गुण कौन सा चाहते हैं, तो ज्यादा का जवाब था कि उसे घर की देखभाल आनी चाहिए। इसमें खाना बनाना, साफ सफाई और बच्चों को अच्छे से पालने के गुण शामिल हैं।

ऐसा नहीं है कि आदमी ही इस सोच के शिकार हैं। कई औरतों को पति का सबसे बड़ा गुण मोटी कमाई ही लगता है ताकि घर चलाने और शौक पूरा करने में किसी तरह का खलल पैदा न हो। ज्यादातर महिलाओं को शुरू में अपनी भावनाएं समझने वाला और आजाद ख्यालों का मेट्रोसेक्सुअल पति चाहिए था, लेकिन फिर उन्हें लगा कि जो आदमी मुझ से ज्यादा वक्त बाथरूम और आइने के सामने गुजारता है, उससे उकताहट हो रही है। उन्हें लगा कि पारंपरिक, आक्रामक स्वभाव वाले पुरुष ही बेहतर जीवनसाथी हो सकते हैं।

मूल समाचार, उस पर आयी टिप्पणियाँ के साथ यहाँ पढ़ा जा सकता है

करवा चौथ के दिन भी महिलाएं पतियों के खिलाफ कार्रवाई पर अड़ीं

करवा चौथ के दिन जहां पत्नियां अपने पतियों की लंबी उम्र और सलामती के लिये व्रत रख रही थीं। वहीं जबलपुर के परिवार परामर्श केन्द्र में अनेक पत्नियां अपने पतियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई किये जाने के अलावा किसी प्रकार के समाधान के लिये सहमत नहीं हुई। परिवार परामर्श केन्द्र से प्राप्त जानकारी के अनुसार करवा चौथ के दिन केन्द्र में वैवाहिक विवाद के 42 मामलों की सुनवाई की गयी। केन्द्र में ऐसा पहली बार हुआ कि इन 42 मामलों में एक भी निपटारा आपसी समझौते से नहीं हो पाया।

सुनवाई के दौरान पति पीड़ित अधिकांश पत्नियां करवा चौथ होने के बावजूद परिवार परामर्श के सलाहकारों के समक्ष पतियों एवं ससुराल पक्ष के लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के अलावा किसी प्रकार के समाधान के लिये सहमत नहीं थी। सलाहकारों की समझाइश के बावजूद 12 मामलों में विवादित परिजनों ने आपसी सहमति से अलग-अलग रहने एवं विधि अनुसार आचरण करने का निर्णय लिया। इसके साथ ही आठ पतियों द्वारा पत्नियों से पीडित होकर आवेदन प्रस्तुत किये थे। लेकिन उनकी पत्नियां दिन भर के इंतजार के बाद भी नहीं आईं। सलाहकारों ने ऐसे पतियों को न्यायालय की शरण लेने की सलाह दी।

Tuesday, 14 October 2008

अरे वाह! अब पति भी किराए पर मिलेंगे

अभी अभी तो हमने पढ़ा था कि अब अपने देश में ही सुंदर महिला साथी भी किराए पर उपलब्ध है। वो भी 10 से 15 हजार रुपए प्रति शाम के हिसाब से। फिर उस पर टिप्पणियाँ भी देखीं कि 'पता नहीं कब पुरूष महिला के बिना जीना सीखेगे।' 'कोई खरीदे गये साथी के साथ सच्ची खुशी कैसे पा सकता है।' 'क्या युवक बिकना नहीं चाहते या युवतियों के पास अभी रुपए नहीं आये?'

इन सबका समाधान अब सामने है। बेशक बात अर्जेंटीना की है, देर-सबेर यहाँ भी वही हाल होगा। वहां जिन महिलाओं को अपने पतियों से इस बात की शिकायत रहती है कि उनके पति घर के काम में उनका हाथ नहीं बंटाते वे अपने शयनकक्ष की शांति बनाए रखते हुए किराए के पतियों की सेवाएं ले सकती हैं। इससे उन महिलाओं को काफी फायदा हो रहा है जिनके पति घर के काम में निपुण नहीं हैं या फिर रुचि नहीं लेते। जी हां, अर्जेटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में एक कंपनी महिलाओं को 15.50 डालर (करीब 760 रुपये) प्रति घंटे के हिसाब से किराए के पति उपलब्ध करा रही है। कंपनी का कहना है कि जो महिला अपने घर के काम में रुचि नहीं लेने वाले पति से परेशान है, वह किराए के पति की सेवाएं ले सकती है। अपनी वेबसाइट पर कंपनी महिलाओं को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह के विज्ञापन भी देती है। मसलन, 'क्या आप घर के काम में हाथ नहीं बंटाने वाले अपने पति से परेशान हैं? तो, सब कुछ भूलकर हमारे पास आइए', और 'अगर आपके पति घर के काम में रुचि नहीं लेते तो सब कुछ भूलकर हमारे पास आइए'।

इस कंपनी का नाम भी बड़ा ही दिलचस्प 'हसबेंड फार रेंट' रखा गया है। कंपनी आमतौर पर अकेली, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को किराए का पति उपलब्ध कराती है। कंपनी द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले किराए के पतियों को बिजली और लकड़ी के काम सहित कई और काम अच्छी तरह आते हैं।

कंपनी के मालिक डेनियल अलोंसो ने बताया कि उन्हें यह अजीबोगरीब आइडिया उस दिन आया जब उनकी पड़ोसन ने अलोंसो की पत्नी से अपना पति किराए पर लेने का मजाक किया। 56 वर्षीय अलोंसो का दावा है कि उनकी कंपनी के पास अभी दो हजार ग्राहक हैं। अलोंसो ने कहा कि सस्ते में घर के काम निपट जाने के कारण महिलाओं को यह सुविधा खूब पसंद आ रही है।

ब्यूनस आयर्स में कंपनी इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि अब उसके पास रात के तीन बजे भी फोन कॉल आते हैं।

सम्बंधित समाचार यहाँ पढ़ा जा सकता है।

Friday, 10 October 2008

नारी की आवाज़ तेज? अरे! यही उन्हें ज्यादा आकर्षक बनाती है।

एक नए शोध में खुलासा हुआ है कि अपने मासिक चक्र के दौरान महिलाओं का स्वर तब तेज हो जाता है जब वह अधिक प्रजननशील होती हैं और यही उन्हें ज्यादा आकर्षक बनाता है। शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि प्रजननशीलता के साथ महिलाओं की आवाज कम या ज्यादा हो जाती है।

असल में, महिलाओं की आवाज अंडोत्सर्ग के एक या दो दिन पहले तेज हो जाती है। इन्हीं दिनों में उनके गर्भधारण की संभावनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह पहला खुलासा है जब आवाज और प्रजननशीलता के बीच संबंधों का पता चला है। इससे इस विचार को समर्थन मिलता है कि मनुष्यों में भी प्रजननशीलता के बाहरी संकेत पशु-पक्षियों की ही तरह दिखाई देते हैं।

शीर्ष शोधकर्ता डा. ग्रेग ब्रायंट ने कहा, हमारा अध्ययन दर्शाता है कि प्रजननशीलता के अनुसार महिलाओं के स्वर में परिवर्तन आता है। वे अंडोत्सर्ग के जितने नजदीक होती हैं, उनका स्वर उतना बढ़ जाता है। हम यह कह रहे हैं कि स्वर तेज होने से उनकी प्रजननशीलता बढ़ जाती है और उनमें आकर्षण बढ़ जाता है। डा. ब्रायंट और कैलिफोर्निया विश्वविघालय के उनके सहयोगी 69 महिलाओं की आवाज के विश्लेषण के बाद इस नतीजे पर पहुंचे।

कुछ अधिक जानकारी यहाँ मिलेगी.

Friday, 3 October 2008

मुझको अपने गले लगा लो, ऐ मेरे जीवनसाथी

महंगे तोहफे देने या शाम को किसी आलीशान होटल में डिनर करने से ही शादीशुदा जिंदगी खुशहाल नहीं होती। शोधकर्ताओं ने खुशहाल शादीशुदा जिंदगी का गैरखर्चीला राज ढूंढ निकाला है। इसके मुताबिक दिन में चार बार अपने साथी को गले लगाकर शादीशुदा जिंदगी को खुशहाल बनाए रखा जा सकता है। अध्ययन के मुताबिक हर महीने अपने साथी के साथ कम से कम 22 बार पर्याप्त समय बिताकर आप अपने रिश्ते मधुर बनाए रख सकते हैं। इसमें साथ टहलना या रोमांटिक डिनर करना जैसी बातें भी शामिल हैं। 'द डेली टेलीग्राफ' में शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया है कि इसके लिए चार हजार जोड़ों पर एक अध्ययन किया गया।

अध्ययन के नतीजों से खुलासा हुआ कि अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुशी तलाश रहे लोगों को महीने में कम से कम सात शाम एक-दूसरे के नाम करनी चाहिए। महीने में दो बार अपने साथी के साथ लांग ड्राइव पर जाने या या फिल्म देखने से भी बात बन सकती है। शोध में पतियों को महीने में एक बार अपनी पत्नी को उपहार देने की भी बात कही गई है। यही नहीं, इसमें महीने में एक शाम अपने साथी से अलग बिताने की भी सलाह दी गई है। मनोचिकित्सक लुडविग लोवेनस्टीन कहते हैं कि दांपत्य जीवन में प्यार भरे शब्द और हाव-भाव काफी मायने रखते हैं। कामकाज और परिवार पालने के चक्कर में लोग अक्सर अपने साथी को नजरअंदाज करते हैं। यहां तक कि लोग गले लगना सरीखी छोटी-छोटी बातों की अहमियत भी भूल जाते हैं।
(साभार: जागरण)

प्राथमिकता के लिहाज से सेक्स 17वें पायदान पर

भारतीय दंपती अभी भी सेक्स जैसे मुद्दे पर आपस में खुलकर बातचीत नहीं करते। एक सर्वे के मुताबिक, भारतीय पुरुषों के लिए प्राथमिकता के लिहाज से सेक्स 17वें पायदान पर आता है, जबकि महिलाओं में यह 14वें नंबर पर है। पारिवारिक जीवन के अलावा पुरुषों ने जीवनसाथी, करिअर, मां या पिता की भूमिका निभाने, आर्थिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होने को अहमियत दी। कमोबेश महिलाओं की भी यही प्राथमिकताएं थीं।

यह सर्वे जानी-मानी दवा कंपनी फाइजर ग्लोबल फार्मास्युटिकल्स द्वारा कराया गया है। इससे निकले नतीजों के मुताबिक यौन संतुष्टि का शारीरिक स्वास्थ्य और प्यार या रोमैंस से गहरा संबंध है। मुंबई के लीलावती अस्पताल के डॉक्टर रुपिन शाह का कहना है कि भारत में जो पुरुष यौन जीवन से संतुष्ट नहीं हैं, उनके समग्र जीवन में भी संतुष्टि की कमी है। भारत में हुए इस सर्वे में 400 इलाके चुने गए थे। इनमें से अधिकतर शहरी क्षेत्र थे। इस पर टिप्पणी करते हुए शाह कहते हैं कि इस सर्वे को शहरी कहा जा सकता है। लेकिन एक डॉक्टर होने के नाते मैं जानता हूं कि देश के ग्रामीण इलाकों से भी सर्वे के ऐसे ही नतीजे निकलते।

सर्वे के अनुसार भारत सहित एशिया प्रशांत क्षेत्र देशों के 57 फीसदी पुरुष और 64 फीसदी महिलाएं सेक्स जीवन से बहुत संतुष्ट नहीं हैं। जो महिला और पुरुष अपने यौन जीवन से बहुत अधिक संतुष्ट हैं, उनमें से 67-87 फीसदी ने कहा कि वे अपने जीवन से खुश हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग जो अपने सेक्स जीवन से कम संतुष्ट हैं, उनमें से महज 10 से 26 फीसदी ने माना कि उनकी जिंदगी खुशहाल है।

इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि पुरुष सेक्स को जिंदगी की अहम प्राथमिकताओं में जगह देते हैं। दूसरी ओर, महिलाएं उसे कम तरजीह देती हैं। सर्वे में भारतीय पुरुषों की स्तंभन कठोरता और उनके सेक्स जीवन में भी सीधा संबंध देखा गया। इस सर्वे में भारत सहित 13 देशों के 25 से 74 की उम्र के कुल 3,957 लोगों को शामिल किया गया था, जिनमें 2016 पुरुष और 1,941 महिलाएं शामिल थीं।

Monday, 29 September 2008

युवती के धूम्रपान की आदत से उसका विवाह टूटते-टूटते बचा

धूम्रपान की आदत एक युवती को इतनी महंगी पड़ी कि उसका विवाह टूटते-टूटते बचा। महिला ने एक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं कि अगर वह दोबारा धूम्रपान करेगी तो उसका पति उसे बिना गुजारा भत्ता दिए तलाक दे सकेगा। युवती का पति धूम्रपान नहीं करता है और वह इसी शर्त पर अपनी पत्नी को मायके से वापस लाया है कि वह अब धूम्रपान नहीं करेगी।

हुआ यूं कि घर में अलग-अलग जगहों से सिगरेट की गंध आनी शुरू हो गई। इससे घरवालों को आश्चर्य हुआ क्योंकि घर में और कोई सिगरेट नहीं पीता था। खिड़कियों के आस-पास सिगरेट के टोटों ने इस बात की पुष्टि कर दी कि घर में कोई धूम्रपान कर रहा है। अमरावती की रहने वाली यह युवती अपने कालेज के समय में धूम्रपान की आदी हो गई थी और वह अपनी ससुराल में छिपकर सिगरेट पीती थी। एक दिन उसके सास-ससुर ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया।

पकड़े जाने पर युवती ने कहा कि वह कई बार धूम्रपान की आदत छोड़ने की कोशिश कर चुकी है लेकिन उसे इसमें सफलता हासिल नहीं हुई। घरवालों ने उसे कड़ी चेतावनी देकर छोड़ दिया लेकिन वह अपनी आदत नहीं त्याग पाई और उसने छिप-छिप कर दोबारा सिगरेट पीना शुरू कर दिया। धूम्रपान छोड़ने संबंधी कोर्स पूरा करने के बाद उसका पति उसे वापस ले आया है लेकिन एक हलफनामे के साथ।

Sunday, 21 September 2008

मां का जुड़ाव, सिजेरियन के बजाय सामान्य प्रसव से पैदा हुए बच्चे से ज्यादा

धरती पर सबसे प्रगाढ़ और करीबी रिश्ता मां और उसके बच्चे का होता है। लेकिन हाल में हुए एक शोध में खुलासा किया गया है कि मां का जुड़ाव आपरेशन (सिजेरियन) के बजाय सामान्य प्रसव से पैदा हुए बच्चे से ज्यादा होता है। अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर जेम्स स्वेन ने शोध के दौरान सिजेरियन बच्चे की मांओं और सामान्य प्रसव से हुए बच्चों की मांओं की ब्रेन स्कैनिंग की। स्कैनिंग के दौरान उन्हें बच्चे के रोने की आवाज भी सुनाई गई। साथ ही उनके बच्चों की देखभाल करने संबंधी विचार भी जाने गए।

जिन मांओं के बच्चे सामान्य प्रसव से पैदा हुए थे उनके मस्तिष्क के कार्टेक्स में रोने की आवाज पर ज्यादा प्रतिक्रिया देखी गई। कार्टेक्स मस्तिष्क का वह हिस्सा होता है जो भावनाओं और संवेदनाओं के लिए जिम्मेदार होता है। स्वेन के मुताबिक सामान्य प्रसव से पैदा हुए बच्चों से ज्यादा जुड़ाव के पीछे न्यूरोहार्मोनल कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें आक्सीटोसिन हार्मोन प्रमुख है। आक्सीटोसिन हार्मोन भावनात्मक जुड़ाव और प्यार का एहसास करने में बड़ी भूमिका निभाता है। इसके उलट सिजेरियन प्रसव में न्यूरोहार्मोनल कारकों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बच्चों से लगाव घट जाता है और प्रसवोत्तर अवसाद का खतरा भी बढ़ जाता है। इन सबके बावजूद स्वेन का कहना है कि हमारा इरादा भ्रांति पैदा करना नहीं है। 

समाचार यहाँ है, अधिक जानकारी के लिये गूगल बाबा है ना!

अपडेट-5:30PM: चित्र व लिंक लगाये गये

Wednesday, 3 September 2008

शादी टूटने का कारण किसी की बेवफाई या अड़ियलपन नहीं, बल्कि खास जीन

शादी टूटना गंभीर समस्या है। मियां-बीवी के बीच व्यवहार संबंधी कई कारणों को इसका जिम्मेदार बताया जाता है। लेकिन स्वीडन के शोधकर्ताओं की मानें तो शादी टूटने का कारण किसी एक की बेवफाई या अड़ियलपन नहीं बल्कि खास जींन होते है। ये जीन पुरुष और महिला के जुड़ाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों ने तलाक और पुरुषों में मिलने वाले एक जीन के बीच एक खास संबंध देखा है। अब बहुत मुमकिन है कि कुछ समय बाद तलाक के मसले सुलझाने के लिए दंपती काउंसिलर की जगह जिनेटिक क्लीनिक की राह पकड़ने लगें।

कैरोलिंस्का इंस्टिट्यूट, स्टॉकहोम के हसी वैलम और उनके सहयोगियों का कहना है कि किसी भी रिश्ते में समस्याओं के कई कारण हो सकते हैं। वैलम भी जोर देकर कहते हैं कि महज़ जीन के आधार पर किसी पुरुष के व्यवहार का आकलन करना ठीक नहीं होगा। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि इस जीन में इसी तरह के असर से हमारे शोध को काफी बल मिलता है। फिर भी इस शोध से इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वैज्ञानिक एक दिन ऐसी दवाएं बना सकेंगे जो इस जीन पर असर करके शादियों को टूटने से बचा सकें।

Saturday, 30 August 2008

स्त्री-पुरुष के विपरीत स्वभाव पर दिलचस्प जानकारियाँ

पुरुष और महिलाएं भले ही हमराही हो गए हों, लेकिन दोनों का मूल स्वभाव आज भी अलग-अलग है। हर काम करने का दोनों का अंदाज़ एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा होता है। पुरुषों को स्वभाव से आक्रामक, प्रतियोगिता में विश्वास रखने वाला और अपनी बातों को छिपाने में माहिर माना जाता है। दोस्तों से बातचीत में पुरुष अपने सारे राज़ भले ही खोल दें, लेकिन किसी अजनबी से गुफ्तगू में पूरी सावधानी बरतते हैं। कारण, उनकी किसी बात से विरोधी फायदा न उठा सकें। पुरुष आमतौर पर अपने कामकाज़ में किसी तरह की दखलंदाज़ी बर्दाश्त नहीं करते।

आपको यह जानकर हैरत होगी कि बड़े से बड़ा नुकसान होने और बहुत ज़्यादा खुशी दोनों ही हालत में पुरुष सेक्स की ज़रूरत शिद्दत से महसूस करते हैं। वे इसे तनाव से मुक्ति पाने वाला भी मानते हैं। वहीं, महिलाएं पुरुष-मित्र या पति से झगड़ा होने पर चाहती हैं कि उनकी बात को पूरी तरह सुना जाए, लेकिन अगर कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से झगड़े के बाद उसे अपनी मज़बूत बांहों का सहारा देता है और दिल से उससे माफी मांग लेता है, तो महिलाएं सब कुछ तुरंत भूल जाती हैं। महिलाएं तारीखों का काफी हिसाब-किताब रखती हैं। उन्हें अपने जीवनसाथी या पुरुष-मित्र के साथ-साथ दोस्तों, परिचितों और पारिवारिक सदस्यों के जन्मदिन और सालगिरह की तारीखें याद रहती हैं, जबकि पुरुष कभी-कभी अपनी महिला-मित्र या पत्नी का भी जन्मदिन भूल जाते हैं।

महिलायें एक समय पर कई काम कर सकती हैं। वे फोन पर बात करते-करते टीवी देख सकती हैं। डिनर तैयार करते समय बच्चों की निगरानी कर सकती हैं, लेकिन पुरुष एक समय में एक ही काम करने में विश्वास रखते हैं।
पुरुषों के मुकाबले महिलाएं संकेत पहचानने में ज़्यादा माहिर होती हैं, लेकिन वे दिल के मामले में अपनी बात किसी पर जल्दी ज़ाहिर नहीं करतीं। महिलाएं अपने साथी की आंखों, बातों और उसके चेहरे के हाव-भाव से उसकी चाहत का अंदाज़ा बखूबी लगा लेती हैं, लेकिन किसी से कुछ कहतीं नहीं। जबकि पुरुष 'वो मुझे चाहती है, वो मुझे नहीं चाहती' की भूलभुलैया में भटकते रहते हैं।

पुरुष किसी भी चीज़ की ज़रूरत होने पर बड़ी आसानी से उसकी मांग कर देते हैं, पर महिलाएं अपनी पसंद की चीज़ की तरफ पहले केवल इशारा ही करती हैं। इसे न समझने पर वह अपनी मांग शब्दों से ज़ाहिर करती हैं। महिलाएं आमतौर पर अपने बच्चों की तमाम ज़रूरतों के प्रति सजग रहती हैं। उनकी पढ़ाई, अच्छे दोस्तों, प्रिय खाद्य पदार्थ , उनकी आशाओं और सपनों से वे पूरी तरह वाकिफ होती हैं, जबकि पुरुषों का ज़्यादातर समय बाहर बीतता है, इसलिए वे अपने बच्चों को उतनी अच्छी तरह नहीं जान पाते।

महिलाएं टीवी देखते समय एक ही चैनल पर ज़्यादा समय तक टिक सकती हैं। किस चैनल पर उनका पसंदीदा प्रोग्राम कब आएगा, यह उन्हें अच्छी तरह पता होता है, वहीं पुरुष एक समय में छह या सात चैनल देखते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि कुछ समय पहले वे किस चैनल पर कौन-सा कार्यक्रम देख रहे थे! महिलाओं को सोने के लिए पूरी शांति की ज़रूरत होती है। हो सकता है कि एक बल्ब जलता रहने पर वह चैन से न सो पाएं, जबकि पुरुष शोर में भी 'घोड़े बेचकर' सो सकते हैं। चाहे कुत्ते भौंक रहे हों, तेज़ आवाज़ में गाना बज रहा हो या बच्चे ऊधम मचा रहे हों, अगर उन्हें सोना है, तो फिर कोई भी चीज़ उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।
(हैलो दिल्ली, नवभारत टाइम्स से साभार)

Monday, 25 August 2008

मैंने किसी की माँ की... किसी की पत्नी की... नहीं की है।

पिछले दिनों एक ब्लॉगर साथी की अच्छी, सामयिक, सुलझी हुयी पोस्ट उनकी सुपुत्री के सौजन्य से पढ़ने को मिली। दैनंदिन व्यस्ततायों के चलते हर पोस्ट पर दो-चार शब्दों से अधिक वाली टिप्पणी कर पाना सम्भव नहीं होता। लेकिन इस कन्या भ्रूण ह्त्या और दहेज़ जैसी सामाजिक बुराई की ओर इशारा करती पोस्ट पर कतिपय नारी समर्थक सामूहिक ब्लॉग की ओर इशारा करने के साथ-साथ मैंने एक विचार भी रख दिया। हालांकि उसके पहले भी सच की टिप्पणी कुछ इसी तरह की थी

मेरी दी गयी टिप्पणी में बस इतना ही कौतूहल था कि ... कोई जानी-पहचानी प्रतिक्रिया क्यों नहीं आयी! मेरा इतना लिखना भर ही काफी साबित हुया बवाल मचाने के लिए।


पढ़ने वालों को, बिना शब्दों पर ध्यान दिए, ऐसा लगा मानो मैंने आधी सृष्टि को चुनौती दे दी हो कि कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं आयी। फिर क्या था, आंकड़े प्रस्तुत किए गए, द्विवेदी जी को 'प्रेरित' किया गया कि वे पतिनुमा प्राणी को बता दें ... अपशब्दों का प्रयोग करना बंद करें
मैं हैरत में पड़ गया! अपशब्द !? ये अपशब्द मैंने कहाँ लिख दिए? ज्ञात होते हुए भी, जिन शब्दों का मौखिक-लिखित-मानसिक-वैचारिक उपयोग कभी नहीं किया, उनके प्रयोग का आरोप! इन माननीया को यदि कभी, वास्तविकता में अपशब्दों का सामना करना पड़ा जाए तो क्या करेंगीं? हालांकि इनका दावा इनके कमेन्ट फॉर्म पर है कि इसी बात को इंगित करते हुए मेरी दूसरी टिप्पणी इस निवेदन के साथ गयी कि द्विवेदी जी के ब्लॉग पर, इन औचित्यहीन बातों पर तो कोई तुक नहीं। उनसे क्षमा चाहता हूँ। ... अनुरोध है कि वे अपने या मेरे ब्लॉग पर ही अपनी बात रखें।

द्विवेदी जी ने पता नहीं क्या सोचकर उन टिप्पणियों को 'उड़ा' दिया। फिर पता नहीं किन परिस्थितियों में, मूल आलेख से ध्यान हटाते हुए 'उन' टिप्पणियों पर आधारित एक पोस्ट ही लिख मारी। जिसमें एक तरह से सफाई पेश की
और मेरा परिचय कराते हुए उन्होंने मेरी माँ, बच्चों , पत्नी, यहाँ तक कि भगवान को भी लपेट लिया! माता जी से नाराज ...कि जन्म ही क्यों दिया? ...अठारवीं शताब्दी में नम्बर लगाया था, पैदा किया बीसवीं के उत्तरार्ध में... ...जरूरत थी एक संतान की, पैदा हो गईं दो... ...एक पाप कर डाला, ब्याह कर लिया। ...पैदा करने में भगवान जी ने जो देरी की, उस के नतीजे में पाला पड़ा ऐसी पत्नी से जो आकांक्षा रखती है। ...कुछ कहें तो बराबर की बजातीं है।


मैं तो दंग रह गया! सोचने लगा कि क्या अपशब्दों के लिए अंग-विशेष से जुड़े किन्हीं खास शब्दों की जरूरत होती है। उनकी पोस्ट ख़त्म होते-होते लगा कि वे अपने लिए ही कह रहें हों कि भड़ास निकालने वाले को रोकने पर उसे कितनी परेशानी होती है? सोच भी नहीं सकते। सोचने की जरूरत भी नहीं। मैंने सोचना बंद कर लिखना शरू कर दिया।

इसी बीच
द्विवेदी जी की पोस्ट पर अनुराग जी की टिप्पणी आयी क्या आपसे वैचारिक असहमति रखना ही नारी विरोधी होना है? जब आप वहां वैचारिक असहमति जताते है तो बहस मुड जाती है ,अपने मुद्दे से भटक जाती है ... हर मुद्दे को स्त्री ओर पुरूष के चश्मे से नही देखना चाहिए ... तो द्विवेदी जी का जवाब गया ...विमर्श में कोई बुरका पहन कर नहीं आता। जब मैंने सच का ब्लॉग देखना चाहा तो पाया कि वहाँ तो बुर्के की आवश्यकता भी नहीं है।

सच ने फिर एक प्रश्न उछाला: मैंने तो बस इतना पूछा था कि पुरवा के ...लेख पर सब ने एक सुर से सही का निशाँ लगाया क्योकि उसके पिता के ब्लॉग पर ये लेख था। अन्य ब्लॉग पर अगर स्त्री विमर्श होता हैं तो गालियाँ और अपशब्दों की टिप्पणी होती हैं। ये भेद भाव क्यों ??

और उसके बाद आने वाली टिप्पणियाँ कैसी आयीं देखिये
अरविन्द मिश्रा - अब यह विमर्श डेंजर ज़ोन में जा रहा है ...फूट लेना ही बेहतर !
उड़न तश्तरी - बड़ी पेंच है भाई -चलते हैं!!
सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी- पढ़ो और फूट लो भाई... माहौल गर्म है।
ज्ञानदत्त पाण्डेय- यहां बोलना खतरे जान है! :-)

इन सबके बीच जब सच ने मुझे संबोधित कर लिखा कि आप को दिवेदी जी की बेटी की पोस्ट पर आप को कोई ओब्जेक्शन नहीं हुआ। तो तरस भी आया कि उसमें ऐसा क्या था जिस पर पर मैं आपत्ति उठाता? वैसे वैचारिक मतभेद के रूप में अपने विचार तो रख ही दिए थे कि ... आलेख में मूल तौर पर दहेज को कारक माना गया है। लेकिन उन परिवारों में, जहाँ दहेज कोई मायने नहीं रखता, वहाँ भी तो यही हाल है।

जब प्रेमचंद जी का उद्धरण दिया गया कि पुरूष, स्त्री के गुण अपना ले तो देवता बन जाता है और स्त्री, पुरूषों के गुण अपना ले तो कुलटा कहलाती है। तो अफसोस फिर हुया कि हमारे साथी शब्दों पर ध्यान क्यों नहीं देते!
कुलटा बनने/होने और कहलाने में बहुत फर्क है।


इस पोस्ट को लिखते-लिखते द्विवेदी जी की नयी पोस्ट पर नज़र पडी। लगा, कुछ नया पढ़ने को मिलेगा, लेकिन फिर वही राग। समझ में नहीं आया तिलमिला कौन रहा है? जब उनका भी यही सोचना है कि महिलाएँ संऱक्षण के बावजूद भी अपशब्द का शिकार होंगी, तो विलाप किस बात का? जब उन जैसा व्यक्ति भी मेरी सामान्य सी भाषा को, रस्सी को पत्थर पर रगड़-रगड़ कर, अपशब्द ठहराने पर तुला हुया हो तो कुछ कहना ही बेमानी है। हाँ, वे आत्मस्वीकृतिनुमा भाषा का प्रयोग करते हुए कहतें है ...जब वे (महिलायें) हासिल कर चुकी होती हैं, तो अन्य को भी प्रेरित करती हैं। कानून और प्रत्यक्ष ऱूप से पुरुषों को भी उन का साथ देना होता है।

इसी बीच पति-पत्नी ब्लॉग पर बांयीं और के मैसेज बॉक्स में किन्हीं संजय द्विवेदी जी का प्रश्न दिखा 'आपकी बीबी ने अभी तक यह ब्लॉग पढ़ा नही है क्या ?' तो लगा कि एक खौफज़दा पर, बीबी का हौव्वा इतना भारी है कि दूसरों को भी धमका रहे हैं!

इन सभी औचित्यहीन बातों के बाद भी, मुझे अभी भी उम्मीद है कि उनके प्रेरणा स्त्रोत ओर वे, मेरी पहली टिप्पणी पर समय देंगें ओर स्वस्थ विचार-विमर्श के लिए रास्ता खुला रखेंगें। टिप्पणियों को ऐसे ही लें जैसे गुलाब के साथ कांटे, न कि काँटों पर ध्यान देते-देते गुलाब का आनंद खो दें। जिस आलेख पर टिप्पणी के कारण इस पोस्ट के लिखे जाने की नौबत आयी है, नि:संदेह एक अच्छा प्रयास है, आंकडों और तथ्यों की रोशनी में। अच्छे प्रयासों की तारीफ होनी ही चाहिए, लेकिन 'प्रेरित' द्विवेदी जी द्वारा व्यक्तिगत प्रहार किए जाने से पूरा आनन्द ही जाता रहा। मुझे अंदेशा है कि वे मुझे जानते हैं। यदि नहीं तो, कोशिश करूंगा, उन्हें मेरा वास्तविक परिचय न मिल पाये।

संतुलित लेखन के बावजूद, यदि किसी को लगता है कि ये 'हिट बेलो द बेल्ट' है तो ध्यान दें कि अधिकतर शब्द मेरे नहीं हैं, आप ही के हैं! मैंने किसी की माँ की... किसी की बेटी की... किसी के परिवार की... किसी की पत्नी की... किसी के भगवान की कोई बात नहीं की है।