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Monday, 16 June 2008

बीवी से परेशान होकर जेल में रहना स्वीकारा

इटली में एक शख्स अपनी पत्नी से इस कदर परेशान था कि उसने घर में रहने के बजाय जेल में रहना पसंद किया। दरअसल, लुइगी फॉलेरियो (45) को चोरी के जुर्म में दो साल की सजा हुई थी। जेल के अधिकारियों ने सजा का दूसरा साल उसे घर में नजरबंदी की हालत में गुजारने को कहा। लेकिन घर जाने के दो दिन बाद ही फॉलेरियो वहां से भागकर पोंटे सैन लिअनार्दो जेल पहुंच गया।

उसने अधिकारियों से गुहार लगाई कि मुझे फिर जेल के अपने पहले वाले सेल में भेज दिया जाए। मैं घर में अपनी पत्नी के साथ नहीं रह सकता। जेल के वार्डन से उसने कहा कि मेरी पत्नी कभी लड़ना-झगड़ना नहीं छोड़ सकती।

Sunday, 15 June 2008

पुत्र की भावनाएँ पिता के लिए, उर्फ फादर्स डे

इस पितृ-दिवस (Father's Day) पर पिछले साल की पोस्ट याद हो आयी। शायद कईयों ने न देखी हो इसलिए पुन: प्रस्तुत है। आप भी आनंद उठाईये।

एक बेटा अपनी उम्र में क्या सोचता है?
४ साल - मेरे पापा महान हैं।
६ साल - मेरे पापा सब कुछ जानते हैं।
१० साल - मेरे पापा अच्छे हैं, लेकिन गुस्सैल हैं।
१२ साल - मेरे पापा, मेरे लिए बहुत अच्छे थे, जब मैं छोटा था।
१४ साल - मेरे पापा चिड़चिड़ाते हैं।
१६ साल - मेरे पापा ज़माने के हिसाब से नहीं चलते।
१८ साल - मेरे पापा हर बात पर नुक्ताचीनी करते हैं।
२० साल - मेरे पापा को तो बर्दाश्त करना मुश्किल होता जा रहा है, पता नही माँ इन्हें कैसे बर्दाश्त करती है?
२५ साल - मेरे पापा तो हर बात पर एतराज़ करते हैं।
३० साल - मुझे अपने बेटे को संभालना तो मुश्किल होता जा रहा है। जब मैं छोटा था, तब मैं अपने पापा से बहुत डरता था।
४० साल - मेरे पापा ने मुझे बहुत अनुशासन के साथ पाल-पोस कर बड़ा किया, मैं भी अपने बेटे को वैसा ही सिखाऊंगा।
४५ साल - मैं तो हैरान हूँ किस तरह से मेरे पापा ने मुझको इतना बड़ा किया।
५० साल - मेरे पापा ने मुझे पालने में काफी मुश्किलें ऊठाईं। मुझे तो तो बेटे को संभालना मुश्किल हो रहा है।
५५ साल - मेरे पापा कितने दूरदर्शी थे और उन्होंने मेरे लिए सभी चीजें कितनी योजना से तैयार की। वे अपने आप में अद्वितीय हैं, उनके जैसा कोई भी नहीं।
६० साल - मेरे पापा महान हैं।

Friday, 13 June 2008

नारी को भोग-वस्तु समझने/ मानने/ पुकारने वाले इसे न पढ़ें

हालांकि यहाँ उल्लेख करना ठीक नहीं लगा, फिर सोचा गया कि भई, परिवार के साथ पति-पत्नी भी तो जुडा है यहाँ! बात यह है कि एक सर्वे किया गया -'महिलाओं को सबसे ज्यादा पसंद क्या है ?' अगर जवाब शॉपिंग हो तो आप सहमत होंगे। लेकिन ठहरिये, सुनिए ध्यान से, क्योंकि शॉपिंग के लिए उनकी दीवानगी की हद यहां तक है कि वे शॉपिंग को सेक्स से ज्यादा महत्व देती हैं। एक सर्वे के नतीजे बताते हैं कि महिलाएं उसी तरह शॉपिंग के बारे में सोचती रहती हैं जिस तरह पुरुष सेक्स के बारे में सोचते हैं।

19 से 45 साल की 778 महिलाओं पर किए गए इस सर्वे में पता चला कि 74 परसेंट महिलाएं हर मिनट में एक बार शॉपिंग के बारे में सोचती हैं। इतना ही नहीं, हैरतअंगेज बात यह है कि महिलाओं का कहना है कि वे अपने पार्टनर के साथ वक्त बिताने से ज्यादा शॉपिंग करना पसंद करेंगी। महिलाएं तो यहां तक कहती हैं कि वे अपनी शॉपिंग के बारे में अपने पार्टनर को नहीं बतातीं ताकि उनके खर्च का पता ना चल सके।

इससे पहले कुछ सर्वे यह बता चुके हैं कि पुरुष हर 52 सेकंड्स में एक बार सेक्स के बारे में सोचते हैं जबकि महिलाएं पूरे दिन में एक बार।

ऑनलाइन फैशन मैग्जीन कॉस्मोपॉलिटन के इस सर्वे के मुताबिक हर पांच में दो महिलाओं ने कहा कि वे जूतों और बैग्स की अडिक्ट हैं और उन्हीं के बारे में सोचती हैं। हर दस में से एक से ज्यादा महिलाएं एक्सेसरीज या मेक-अप के बारे में सोचती रहती हैं। सर्वे में शामिल महिलाएं अपनी इनकम का औसतन 30 फीसदी हिस्सा कपड़ों पर खर्च कर देती हैं। इसका दिलचस्प पहलू यह है कि मनोवैज्ञानिक इस बात को अच्छा नहीं मानते। यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लैमॉर्गन की साइकॉलजिस्ट जेन प्रिंस के मुताबिक लोग उन्हीं बातों के बारे में सोचते हैं जिनसे उन्हें खुशी मिलती है, लेकिन हर मिनट में एक बार किसी चीज के बारे में सोचना लत की निशानी है।

Friday, 23 May 2008

पत्नी ने जींस नहीं पहनी, पति ने तलाक का नोटिस दिया

भारतीय युवा वर्ग पाश्चात्य संस्कृति की गिरफ्त में इस कदर आ गया है कि आज उसे ज़रा सी बात पर सात फेरों का बंधन तोड़ने में जरा सी भी हिचक नहीं होती। एक युवक ने अपनी पत्नी को महज इसलिए तलाक देने का फैसला कर लिया क्योंकि वह जींस अन्य पश्चिमी पहनावा पहनने से इनकार कर रही थी। वह तो भला हो अदालत का, जिसने दोनों को ढेरों नसीहतें देकर सुलह के लिए मामले को मध्यस्थता केंद्र के पास भेज दिया। राष्ट्रीय सहारा का समाचार है कि पूनम व पवन (बदले हुए नाम) ने तीन साल पहले प्रेम विवाह किया था लेकिन शादी के बाद दोनों के बीच पहनावे को लेकर विवाद शुरू हो गया। पवन अपनी पत्नी को जींस व अन्य पश्चिमी पहनावा पहनने के लिए जिद करने लगा लेकिन पूनम ने इनकार कर दिया। इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और पूनम अपने मायके चली गई। करीब तीन महीने पहले पूनम को एक नोटिस मिला, जिसमें उसके पति ने तलाक के लिए अदालत में अर्जी दाखिल की थी।

पूनम ने कहा कि तलाक के लिए जो आरोप लगाए गए हैं, वे आधारहीन हैं। उसे यह अधिकार है कि वह किस तरह के कपड़े पहने। उसने यह भी कहा कि यदि इस बात के लिए पवन उसे तलाक देना चाहता है तो इसका मतलब यह है कि उसके पति के दिल में उसके ’प्रेम’ की कोई अहमियत नहीं है। इस मामले में अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद पति–पत्नी दोनों को आपस में सुलह करने को कहा। कोर्ट ने दोनों पक्षों को नसीहत देते हुए मामला मध्यस्थता केंद्र में भेज दिया। यहां पर दोनों में सुलह कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।

Thursday, 22 May 2008

हर तीसरा पुरूष घरेलू हिंसा का शिकार

आम तौर पर घरेलू हिंसा की बात आती है तो इसके शिकार के रूप में महिलाओं की ही छवि सामने आती है। लेकिन अमेरिका में हुए एक सर्वे के नतीजों पर नजर डालें तो यह धारणा बदल जाती है। सर्वे के मुताबिक अमेरिका के करीब एक-तिहाई पुरुष घरेलू हिंसा के शिकार है। यह अलग बात है कि महिलाओं के उलट, पुरुषों की यह पीड़ा सामने नहीं आ पाती। इस उत्पीड़न का पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

इस सर्वे में 400 लोगों की राय शामिल की गई। इनसे टेलीफोन पर सवाल-जवाब किए गए। साक्षात्कार में पांच प्रतिशत पुरुषों ने पिछले साल घरेलू हिंसा का शिकार होने की बात स्वीकारी, जबकि 10 फीसदी ने पिछले पांच सालों के दौरान और 29 फीसदी पुरुषों ने जीवन में कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार होने की बात कबूल की। यह सर्वे राबर्ट जे रीड की अगुवाई में हुआ। रीड का कहना है कि पुरुष प्रधान समाज में घरेलू हिंसा के शिकार पुरुष शर्मिदगी महसूस करते है, क्योंकि समाज में उनको शक्तिशाली माना जाता है। वह बताते हैं कि घरेलू हिंसा के शिकार पुरुषों में युवाओं की संख्या कहीं ज्यादा है। 55 साल से अधिक उम्र वाले लोगों की तुलना में युवाओं की संख्या दोगुनी बताई गई है। रीड ने कहा कि इसका कारण है कि 55 से ऊपर के पुरूष घरेलू हिंसा के बारे में बात करने को तैयार नहीं होते हैं। अध्ययन ने इस भ्रम को भी गलत साबित कर दिया है कि घरेलू हिंसा के शिकार पुरूषों पर इसका कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ता। शोधकर्ताओं ने पाया कि घरेलू प्रताड़ना का शिकार पुरूषों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका काफी गंभीर प्रभाव पड़ता है।

सर्वे में घरेलू हिंसा के दायरे में धमकाना, अभद्र टिप्पणी, शारीरिक हिंसा-मारपीट या फिर यौन संबंध के लिए मजबूर करने करना आदि को शामिल किया गया था। अध्ययन रिपोर्ट ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रीवेंटिव मेडिसिन’ के जून में आने वाले अंक में प्रकाशित किया जाएगा।

Wednesday, 14 May 2008

शादीशुदा जिंदगी का मजा छीन लेते हैं बच्चे!

अपना परिवार बढ़ाना विवाहित जीवन का महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि बच्चे आने पर पति-पत्नी की जिंदगी और खुशहाल हो जाती है। लेकिन एक अध्ययन से इस पुरानी मान्यता के उलट निष्कर्ष मिल रहे हैं। एक शोधकर्ता ने दावा किया है कि शादीशुदा जिंदगी में बच्चों की गैरमौजूदगी ही खुशहाली का सबब है और बच्चे होने पर सारी खुशियां हवा हो जाती हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रो. डेनियल गिलबर्ट का कहना है कि शादीशुदा जिंदगी का मजा तभी तक है जब तक पति-पत्नी के बीच बच्चा नहीं आता है। पति-पत्नी अपनी खुशी तभी जी पाते हैं जब बच्चे घर से बाहर जा चुके होते हैं।

प्रो. गिलबर्ट का कहना है कि माता-पिता बच्चों पर वक्त और पैसे खर्च करते हैं। वे इसकी वापसी भी चाहते हैं। उनकी यह चाहत इस मान्यता की एक वजह बन जाती है कि बच्चे उनकी जिंदगी खुशगवार बनाते हैं। गिलबर्ट के अनुसार आंकड़े बताते हैं कि शादीशुदा लोग अविवाहितों, तलाकशुदा और अकेले रह रहे लोगों की अपेक्षा ज्यादा सुखी रहते हैं। शादीशुदा लोग न केवल लंबी जिंदगी जीते हैं, बल्कि यौन सुख का लुत्फ कुंवारों की तुलना में ज्यादा उठाते हैं। साथ ही वे प्रति व्यक्ति आय की तुलना में ज्यादा पैसा कमाते हैं। लेकिन जैसे ही उनके बच्चे होते हैं, सारी खुशी गायब हो जाती है। प्रोफेसर के मुताबिक बच्चा होने के बारे में सोचना खुशी देता है, लेकिन जब बच्चे हो जाते हैं तो परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आपके वैवाहिक सुख में खलल पड़ने लगता है। यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब बच्चे किशोरावस्था में पहुंचते हैं। प्रो. गिलबर्ट ने खुशी और इसके कारण विषय पर एक सेमिनार में ये बातें कहीं हैं।

पतियों के हाथों महिलायें क्यों पिटती हैं? सरकार भी जानना चाहती है

आख़िर सरकार ने मान लिया है कि राष्ट्रीय महिला आयोग, महिलाओं पर लगातार बढ़ रहे जुल्म-ओ-सितम को रोकने में बहुत कारगर भूमिका निभा पाने में नाकाम रहा है। अब, राष्ट्रीय महिला आयोग को सरकार और अधिकार संपन्न बनाएगी। इसके लिए कानून में संशोधन किया जाएगा। साथ ही महिलाओं पर जुल्म की मूल वजहों को जानने और उनके प्रति पुरुषों के नजरिये में बदलाव लाने के मद्देनजर सरकार जल्द ही एक गोलमेज सम्मेलन भी करेगी। इसमें पत्नी पीड़ित पतियों की भी बातें सुनी जाएंगी।

महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री [स्वतंत्र प्रभार] रेणुका चौधरी ने पिछले दिनों राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक पूरक प्रश्न के जवाब में सदन को यह जानकारी दी। एक सवाल के जवाब में चौधरी ने कहा कि महिलाओं को लेकर पुरुषों की भी अपनी समस्याएं हैं। साथ ही उनकी सोच में बदलाव लाना भी जरूरी है। इसके बगैर सकारात्मक नतीजे नहीं आ सकते। लिहाजा उनका मंत्रालय एक गोलमेज सम्मेलन कराने की तैयारी कर रहा है। सम्मेलन में महिलाओं के साथ पत्नी पीड़ित पतियों, सामाजिक मनोविज्ञानियों और दूसरे प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। मकसद यह भी जानने का है कि पतियों के हाथ महिलाओं की पिटाई की आखिर मूल वजहें क्या हैं?